उत्तराखंड
ऊधम सिंह नगर के काशीपुर में चैती मेले की 170 साल पुरानी परंपरा, ‘नखासा बाजार’ इस साल नहीं लगेगा. यह बाजार नवरात्रों में लगता था.लेकिन इस बार ज़मीन नहीं मिलने के कारण इसे रद्द कर दिया गया है.
चैती मेले का यह बाजार दुर्लभ घोड़ों की नस्लों के लिए जाना जाता था. एक समय था जब यहां पूरे भारत से व्यापारी यहां आते थे. स्थानीय लोगों के अनुसार, सुल्ताना डाकू और फूलन देवी जैसे डाकू भी घोड़े खरीदने के लिए भीड़ में वेष बदलकर आते थे.
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाजार का अचानक बंद होना एक युग का अंत है.दो एकड़ जमीन, जहां कभी यह बाजार लगता था, अब पांडा परिवार के सदस्यों के बीच बांट दी गई है.पांडा परिवार ही इस मेले की देखभाल करता है.उन्होंने व्यापारियों को बताया कि अब उनके पास बाजार लगाने के लिए जमीन नहीं है.
1855 से शुरू हुआ था यह बाज़ार
माना जाता है कि इस बाजार की शुरुआत 1855 में यूपी के रामपुर के एक बड़े घोड़ा व्यापारी हुसैन बख्श ने की थी.नखासा बाजार कभी अफगानिस्तान, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के व्यापारियों का अड्डा था.लेकिन, पिछले कुछ सालों में यहां आने वाले व्यापारियों की संख्या कम हो गई थी. अब यहां पंजाब, गुजरात, यूपी और हरियाणा से ही व्यापारी आते थे. वे 40,000 रुपये से लेकर 40 लाख रुपये तक के घोड़े बेचते थे.हर साल 50 से ज्यादा घोड़े बिक जाते थे.
स्थानीय इतिहासकार रूपेश सिंह ने बताया कि लगभग 10 से 12 नस्ल के घोड़े हर साल बिक्री के लिए आते थे. मारवाड़ी, सिंधी, काठियावाड़ी, स्पीति और मणिपुरी जैसी नस्लें, जिनकी चाल बहुत तेज होती है, यहां के मुख्य आकर्षण थे.
रूपेश सिंह ने आगे कहा, ‘इस बाजार का महत्व सिर्फ व्यापार से कहीं ज्यादा था.यह हमारे अतीत का जीता-जागता सबूत था, जहां इतिहास और व्यापार आपस में जुड़े हुए थे.यह एक सांस्कृतिक संस्थान था जो इस क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को दिखाता था.इसका बंद होना सिर्फ काशीपुर के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक नुकसान है।’
पिछले कुछ सालों में खरीदारों की संख्या कम होने से बाजार पर संकट के बादल मंडरा रहे थे.बाजार के बंद होने की खबर से कई व्यापारी हैरान रह गए.वे दूर-दूर से एक और कामयाब सीजन की उम्मीद लेकर आए थे. रविवार की सुबह, यूपी और राजस्थान के शहरों से लगभग 100 घोड़े आए, लेकिन उन्हें वापस कर दिया गया. एक व्यापारी ने निराशा भरी आवाज में कहा, ‘हम दुकान लगाने के लिए तैयार थे, लेकिन कोई जगह ही नहीं थी।’
मां बाल सुंदरी देवी मंदिर के मुख्य पुजारी, कृष्ण गोपाल अग्निहोत्री ने बताया कि ‘हमारे पास घोड़ा व्यापारियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.’ व्यापारी अपने घोड़ों को लेकर वापस घर की ओर चल दिए.आज उस खाली मैदान पर धूल जम चुकी है, जो कभी चहल-पहल से भरा रहता था.