उत्तराखंड कें खटीमा में वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो दिल्ली उत्तराखंड एसटीएफ और तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी की सयुंक्त टीम द्वारा टाइगर की खाल और उसकी हड्डीयों कें साथ पकड़े गए वन्य जीव तस्करों कें मामलें विवाद खड़ा हों गया हैँ. दरअसल पकड़े गए तस्करों से सख़्ती से हुईं पूछताछ कें दौरान यह बात सामने आई थी कि जिस टाइगर का उनके द्वारा शिकार किया गया था वह उत्तर प्रदेश कें बिजनौर जनपद कें नजीबाबाद डिवीजन कें बढ़ापुर रेंज में था.लेकिन उत्तर प्रदेश वन विभाग कें अधिकारियों नें उत्तराखंड वन विभाग कें दावों कों पूरी तरह ख़ारिज कर दिया हैँ.
बढ़ापुर रेंज में टाइगर कें शिकार से नजीबाबाद वन विभाग कें अधिकारियों नें किया इंकार
पकड़े गए तस्करों कें खुलासे कें बाद इस मामलें में यूपी कें नजीबाबाद डिवीजन कें डीएफओ नें इसे उत्तराखंड वन विभाग की मनगढ़त कहानी करारा दिया हैँ.डीएफओ आशुतोष पांडेय नें मीडिया कों दिए अपने एक बयान में कहा हैँ कि उनके डिवीजन कें बढ़ापुर रेंज में किसी भी टाइगर का शिकार नहीं हुआ हैँ बल्कि उत्तराखंड वन विभाग अपनी नाकामी छुपाने कें लिए उनके डिवीजन कों बदनाम कर रहा हैँ.डीएफओ आशुतोष पांडेय नें अपने बयान में कहा कि संपूर्ण भारत में टाइगर्स की गणना कैमरा ट्रैप पद्धति से कराई जाती है.कैमरा ट्रैप में कैद होने वाले सभी बाघों के चित्र नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी द्वारा संचारित कराए जाते हैं. प्रत्येक टाइगर के शरीर के स्ट्रिप्स का पैटर्न अलग-अलग होता हैँ.साथ ही उन्होंने कहा कि बाघ की खाल के स्ट्रिप का मिलान एनटीसीए के डाटा बेस से कराकर यह जांच की जा सकती है कि टाइगर गणना में शिकारियों द्वारा बरामद खाल से संबंधित बाघ किस रिपोर्ट में शामिल है.डीएफओ आशुतोष पांडेय नें यह भी दावा किया कि हाल के वर्षों में बिजनौर वन प्रभाग और नजीबाबाद के किसी भी रेंज में बाघ का शिकार नहीं हुआ है
डीफओ आशुतोष पांडेय कें दावे कें बाद उत्तराखंड वन विभाग की सफाई
उत्तराखंड एसटीएफ, वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो दिल्ली और तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी की एसओजी की संयुक्त टीम द्वारा पकड़े गए वन्य जीव तस्करों कें मामलें में सवाल खड़े हों गए हैँ.तस्करों कों पकड़ने वाली संयुक्त टीम द्वारा खुलासा किया गया कि शनिवार 22 जुलाई देर रात एसटीएफ को सूचना मिली कि चार शातिर तस्कर सफेद रंग की बोलेरो गाड़ी संख्या UK-05TA-2815 से खटीमा आ रहे हैं. इस पर संयुक्त टीम ने घेराबंदी कर उन्हें खटीमा पहेनिया टोल प्लाजा के पास रोक लिया और तलाशी लेने पर गाड़ी के अंदर से बाघ की 11 फीट लंबी खाल और 10.4 किलो हड्डियां बरामद की गई.गिरफ्तार तस्करों ने पूछताछ में एसटीएफ को बताया कि वह बाघ की खाल और हड्डी को काशीपुर निवासी एक व्यक्ति से लाए और बेचने के लिए खटीमा ला रहे थे.पूछताछ में आरोपियों ने अपना नाम कृष्ण कुमार निवासी ग्राम बगीचा(धारचूला), गजेंद्र सिंह, संजय कुमार और हरीश कुमार निवासी गोठी कालिका (धारचूला) पिथौरागढ़ बताया. आरोपियों से ज़ब पूछताछ की गई कि इतने बड़े बाघ का शिकार कहां और कब किया गया तों इस पूछताछ में देहरादून निवासी अर्जुन उर्फ़ कौआ का नाम सामने आया, जिसे बाद में काशीपुर से गिरफ्तार किया गया.
कौन हैँ टाइगर का शिकार करने वाला अर्जुन उर्फ़ कौआ
नजीबाबाद वन प्रभाग के बढ़ापुर रेंज में बाघ का शिकार करने वाले वाला अर्जुन सिंह उर्फ अर्जुन नाथ उर्फ कौआ उर्फ राजेंद्र कबाड़ की आड़ में पैंगोलिन की तस्करी करते-करते बाघ का शिकारी बन बैठा. दस साल पहले राजाजी नेशनल पार्क में पैंगोलिन तस्करी के मामले में वन विभाग ने उसकी गिरफ्तारी की थी और इस मामले में उसे सजा भी हुई थी.उसने खुद ही बढ़ापुर रेंज में तीन बाघों का शिकार करना स्वीकारा है.पूछताछ में अर्जुन उर्फ़ कौआ नें बताया कि टाइगर द्वारा बढ़ापुर रेंज में जिस जंगली सूअर का शिकार किया गया था उस पर उसने चूहें मारने दवा छिड़क दी थी और टाइगर नें जिस सूअर कों खाया तों वह भी बाद में जंगल में मर गया.2 माह पुरानी घटना का जिक्र करतें हुए अर्जुन उर्फ़ कौआ नें बताया कि जंगल में मौका मिलने पर उसने टाइगर की खाल और उसकी हड्डियां निकाल ली, जिसे बाद में उसने पकड़े गए तस्करों कों बेच दी थी.
यूपी में करता था शिकार, उत्तराखंड में करता था सौदा
शातिर तस्कर अर्जुन ने पूछताछ में बताया कि नजीबाबाद के बढ़ापुर रेंज के जंगल में बाघ होने और आसानी से घुसपैठ की वजह से इस जगह से चुनता था. यहां बाघ का शिकार करने के बाद वह खाल और हड्डियां सुरक्षित ठिकाने पर रख देता था. इसके बाद खाल और हड्डियों का सौदा अलग-अलग नाम से करता था. जहां सौदा सुरक्षित और मुनाफे का लगता था, वहां डिलीवरी दे देता था.





