उत्तराखंड
राजनीतिक दलों के अंदर मची आपसी खींचतान और गुटबाजी अक्सर उन नेताओं पर भारी पड़ जाती हैँ जों अपना राजनीतिक भविष्य स्थानीय स्तर पर संवारने का सपना देख रहें होते हैँ. हासिए पर चल रहीं कांग्रेस तों इसकी भुगतभोगी हैँ हीं और अब भाजपा भी उसी नक्शे कदमों पर आगे बढ़ रहीं हैँ. बात यदि कोटद्वार विधानसभा की हों तों यहाँ के भाजपा कार्यकर्ता और नेता आपसी गुटबाजी के कारण खुद हीं पिछले कुछ सालों से हासिए पर चल रहें हैँ.भाजपाईयों की आपसी गुटबाजी और खींचतान का हीं यह नतीजा हैँ कि क़ोई भी ऐसा स्थानीय भाजपा नेता पिछले 15 सालों में उभर कर सामने नहीं आ पाया हैँ जिस पर प्रदेश और भाजपा अलाकमान अपना विश्वास जताते हुए उसे राज्य विधानसभा या फिर लोकसभा का टिकट देकर उसका राजनीतिक भविष्य संवारने का काम करती.पिछले एक दशक से अधिक के कोटद्वार के राजनीतिक हालतों पर यदि नजर डाली जाए तों साफ हों जाता हैँ कि कोटद्वार में स्थानीय स्तर पर भाजपा के पास क़ोई भी ऐसा चेहरा नहीं रहा जिस पर भाजपा के बड़े नेता अपना विश्वास जता कर उसे उभरने का अवसर प्रदान करतें.
भाजपा में स्थानीय की जगह बाहरी नेताओं के लिए सेफ लैंडिंग रहीं कोटद्वार विधानसभा
राज्य गठन के बाद पहली बार हुए वर्ष 2002 के विधानसभा चुनावों में भाजपा प्रत्याशी के रूप में अनिल बलूनी कों पार्टी द्वारा चुनावी मैदान में उतारा गया, जबकि इस दौरान स्थानीय भाजपा नेता, राजेंद्र अंथवाल, भुवनेश खर्कवाल, शैलेन्द्र रावत सहित भाजपा के कुछ दूसरे नेता टिकट की दौड़ में शामिल थे, लेकिन भाजपा नें इन सब कों दरकिनार करतें हुए युवा अनिल बलूनी कों चुनावी मैदान में उतार दिया,लेकिन अनिल बलूनी का भाजपा प्रत्याशी के रूप में नामांकन रद्द होंने के कारण पार्टी कों मजबूरन फिर भाजपा से बागी होकर चुनाव लड़े भुवनेश खर्कवाल कों कांग्रेस प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह नेगी के खिलाफ समर्थन देना पड़ा,जिसमें भुवनेश खर्कवाल कों हार का मुँह देखना पड़ा.उधर अपना नामांकन रद्द होंने के बाद हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई जीत कर आए अनिल बलूनी नें वर्ष 2005 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा का उप-चुनाव लड़ा लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह नेगी के खिलाफ उन्हें भी हार का मुँह देखने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा नें जरूर स्थानीय प्रत्याशी के रूप में शैलेन्द्र सिंह रावत कों चुनावी मैदान में उतारा और वह कांग्रेस प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह नेगी के खिलाफ चुनाव जीत भी गए लेकिन उपचुनाव के लिए मुख्यमंत्री बीसी खंडूडी के लिए कोटद्वार विधानसभा से इस्तीफा नहीं देनें के कारण भाजपा का एक धड़ा पूरे 5 साल उनकी राजनीतिक ज़मीन कमज़ोर करता रहा.
जिसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री बीसी खंडूडी शैलेन्द्र सिंह रावत का टिकट कटने के बाद खुद कोटद्वार विधानसभा से चुनाव लड़ बैठे और कांग्रेस प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह नेगी से चुनाव हार गए. हालांकि हार के पीछे जों भी कारण रहें हों लेकिन विरोधियो द्वारा इस हार का ठीकरा पूर्व विधायक शैलेन्द्र सिंह रावत के सिर फोड़ दिया गया, जिससे वह आज तक उभर नहीं पाए हैँ.
बीसी खंडूडी की हार के बाद स्थानीय भाजपा नेताओं कों लगने लगा था कि अब पार्टी नेतृत्व किसी स्थानीय भाजपा नेता कों हीं 2017 के विधानसभा चुनावों में तबजू देंगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर भाजपा नेताओं में टिकट की मारामारी और गुटबाजी कों देखते हुए पार्टी नें फिर से एक बार पैराशूट प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में शामिल हुए हरक सिंह रावत कों कोटद्वार विधानसभा में अपने प्रत्याशी के रूप में उतार दिया और हरक सिंह रावत नें भी मात्र 15 दिनों में हीं कोटद्वार का राजनीतिक दुर्ग फ़तेह करतें हुए कांग्रेस नेता सुरेन्द्र सिंह नेगी कों पटखनी दें दी. लेकिन कोटद्वार विधानसभा में अपने कार्यकाल के दौरान अपने बयानों और कार्यशैली से खूब सुर्खियों में रहने वालें हरक सिंह रावत वर्ष 2022 में कोटद्वार का मायावी राजनीतिक तिलिस्म भेद पाते इससे पहले हीं भाजपा नें उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में 6 साल के पार्टी से ना केवल बाहर का रास्ता दिखा दिया बल्कि उनके कारनामों के खिलाफ सीबीआई और ईडी की जाँच तक बिठा दी, इसका परिणाम यह हुआ कि हरक सिंह रावत उसी में आज तक उलझ कर रह गए. इधर वर्ष 2022 में हरक सिंह रावत का टिकट कटने के बाद स्थानीय भाजपा के कई नेताओं कों उम्मीद थीं कि पार्टी इस बार उन्हीं के बीच के किसी नेता कों टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारेगी, लेकिन यहां भी भाजपा नें तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए यमकेश्वर से पार्टी की विधायक रहीं ऋतू खंडूडी भूषण पर दांव खेलते हुए उन्हें चुनावी मैदान में उतार दिया और वह भी मोदी योगी के नाम पर चुनाव जीतकर राज्य विधानसभा अध्यक्ष बन गई.
कोटद्वार में भाजपा नें आज तक नहीं किया अपना प्रत्याशी रिपीट
अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के उत्तराखंड की कोटद्वार विधानसभा उन चुनिदा विधानसभाओं में से एक रहीं हैँ जहां भाजपा नें आज तक अपना प्रत्याशी रिपीट नहीं किया हैँ. पहले अनिल बलूनी फिर शैलेन्द्र सिंह रावत फिर बीसी खंडूडी और इसके बाद हरक सिंह रावत और फिर ऋतू खंडूडी भूषण कों भाजपा नें कोटद्वार विधानसभा के चुनावी मैदान में उतारा. इसके पीछे चाहे जों भी कारण रहें हों लेकिन अंदर खाने भाजपा के एक वर्ग के भीतर इससे बड़ा असंतोष आज भी देखने कों मिलता हैँ. राज्य गठन के बाद से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में कोटद्वार विधानसभा से सुरेन्द्र सिंह नेगी नें एक ओर सभी चुनाव लड़े वहीं दूसरी ओर भाजपा हर बार दूसरी विधानसभाओं के लाए गए प्रत्याशियों के सहारे चुनावी मैदान में उतरी,और उसे इसका फायदा और नुकसान भी हुआ. कुल मिलाकर यदि देखा जाए तों भारतीय जनता पार्टी आज तक स्थानीय स्तर पर किसी ऐसे चेहरे कों तलाश नहीं कर पाई हैँ जिसकों वह कोटद्वार विधानसभा में उतार सकें.यानि साफ हैँ कि कोटद्वार विधानसभा के निष्ठावान और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं पर भाजपा कों पूरा भरोसा हैँ कि चाहे बाहर से लाकर किसी कों भी चुनाव लड़ा दिया जाए उसकी जीत की गारंटी उस दरी बिछाने और झंडा डंडा उठाने वालें कार्यकर्ताओं का पसीना हैँ जों कोल्हू के बैल की तरह रात दिन पार्टी की सेवा में लगा रहता हैँ.





