उत्तराखंड में इस बार मॉनसून में रिकॉर्ड तोड़ बारिश हुई. जिस कारण प्रदेश में लगातार कई मल्टीपल लैंडस्लाइड, क्लाउडबर्स्ट और फ्लैश फ्लड की घटनाएं रिकॉर्ड की गई. इस मॉनसून सीजन में अब तक सबसे ज्यादा नुकसान उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग,पौड़ी और उधम सिंह नगर में देखने को मिला है. प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास उत्तराखंड से पुराना है, लेकिन इस बार जिस तरह से आपदाएं संभलने तक का समय नहीं दे रही है, निश्चित तौर पर ऐसी स्थिति उत्तराखंड में काफी सालों बाद हुई है.
अलकनंदा के ऊपरी कैचमेंट में अत्यधिक वाटर डिस्चार्ज: वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट श्रीनगर में अलकनंदा के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि गढ़वाल मंडल के कई जिलों में फैली अलकनंदा नदी के अपर कैचमेंट में जियोलॉजिकल बदलाव हो रहे हैं और उसका असर नदियों में देखने को मिल रहा है. उन्होंने बताया कि अलकनंदा के अपर कैचमेंट में मौजूद इसकी सभी सहायक नदियां धौली गंगा, मंदाकिनी और पिंडर जैसी सभी नदियां अपने उग्र वेग में है. इन सभी सहायक नदियों के किनारे पढ़ने वाले कस्बों और बसावटों में नुकसान देखने को मिल रहा है. इसमें रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और पिंडर नदी पर पड़ने वाले थराली और उससे आगे बुपाटा आदि जगह मौजूद हैं.
अलकनंदा नदी की हार्ड रोक्स आई ऊपर: वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट के अनुसार, अलकनंदा नदी इससे पहले कई बार इस तरह का उग्र रूप ले चुकी है. उन्होंने बताया कि अलकनंदा नदी इस सीजन के अपने सबसे अधिकतम वाटर लेवल पर इस समय बह रही है. उन्होंने धारी देवी में नदी के जलस्तर का जिक्र करते हुए कहा कि यह जलस्तर अब बिल्कुल धारी देवी मंदिर के करीब है. नदी का पानी धारी देवी के मुख्य मार्ग पर आ चुका है. इसकी एक वजह यह भी है कि श्रीनगर डेम में पानी रुकता है और पीछे की तरफ बढ़ता जाता है.
उन्होंने श्रीनगर में नदी के स्वरूप को देखते हुए बताया कि ऊपर पहाड़ों से बहुत ज्यादा मात्रा में सेडिमेंट नदी में डिस्चार्ज हुआ है. अलकनंदा नदी का जो विकराल रूप है, वह श्रीनगर में देखने को मिलता है. क्योंकि अलकनंदा संकरी घाटियों से निकलकर श्रीनगर में काफी फैल जाती है और यहां पर नदी का फैलाव भी काफी ज्यादा देखने को मिलता है.
जियोलॉजिस्ट ने बताया कि श्रीनगर में अलकनंदा नदी द्वारा बनाए गए कई ऐसे निशान हैं, जो काफी साल पुराने थे और आज नदी उन्हें निशानों को छू रही है. उनका कहना है कि नदी के बीच में पानी उथला हुआ है यानी नदी के नीचे की हार्ड रोक्स (कठोर चट्टान) एक्सपोज हो चुकी हैं जो कि बताता है कि नदी ने अपने बड़े हिस्से को क्लीन किया है और काफी ज्यादा मात्रा में सेडिमेंट यहां से आगे बह कर गया है.
उन्होंने बताया कि अलकनंदा नदी का जो कर्वेचर है या फिर मैक्सिमम थ्रस्ट एरिया है, वह चौरास है और वहां पर लगातार नदी भू-कटाव कर रही है. वहीं श्रीकोट को उन्होंने रिवर टेरेस एरिया है और यहां पर भी अगर बरसात होती है तो भू कटाव शुरू हो जाएगा. उन्होंने श्रीनगर में लगातार हो रहे निर्माण को लेकर भी आगाह किया है कि इस तरह से नदी किनारे अवस्थित निर्माण अगर किया जाएगा तो स्थिति गंभीर हो सकती है
नदियों नालों से सुरक्षित दूरी पर हो निर्माण: वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट बताते हैं कि हिमालय की नदियों की ऊर्जा का अंदाजा आज तक कोई नहीं लगा पाया है. लेकिन फिर लोग यह सोचते हैं कि हम किनारे हैं और बच जाएंगे, जो की बिल्कुल भी सुरक्षित सोच नहीं है. उन्होंने कहा कि हमें खुद को सुरक्षित रखना है तो पहाड़ों में छोटे नालों या बड़ी नदियां को अपने आप से सुरक्षित दूरी पर रखना होगा. नदियों और नालों के किनारे बसावटों को कम करना होगा और सरकार को भी अपनी निर्माण पॉलिसियों में इस विषय को शामिल करना चाहिए.
14 साल बाद अलकनंदा का उग्र रूप: वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट ने बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले 2011 में इसी तरह से अलकनंदा नदी अपने अधिकतम जलस्तर पर थी और अब 14 साल बाद अलकनंदा इतनी विकराल स्वरूप में है.
25 सालों में दूसरी बार अलकनंदा अपने अधिकतम स्तर पर.
श्रीनगर में अलकनंदा का जल स्तर 29 अगस्त 2025 को इस सीजन के अपने अधिकतम 536 मीटर पर था.
इससे पहले 2013 में 17 जून 2013 को अलकनंदा नदी का जलस्तर 537.90 मीटर पहुंचा था.
साल 2011 में 16 अगस्त को अलकनंदा का जलस्तर 535.44 मीटर गया था.





