उत्तराखंड के जंगलों में भेड़ियों की लगातार कम होती संख्या भी मानव वन्य-ज़ीव संघर्ष का एक बहुत बड़ा कारण बनती जा रहीं है.दरअसल जंगल का इंजीनियर कहें जानें वाले भेड़ियों की संख्या में पिछले कुछ सालों में भारी कमी देखने को मिली है.जिसके कारण गुलदार,भालू के साथ ही दूसरे वन्य ज़ीवों की संख्या में कहीं गुना वृद्धि देखने को मिली है.
दरसअल झुंड में शिकार करने वाले भेड़िये गुलदार,भालू के साथ ही दूसरे जंगली जानवरों के बच्चों को अपना निशाना बनाते है.लेकिन इनकी घटती संख्या नें पारिस्थितिकी तंत्र की उच्च हिमालय की इस श्रृंखला को कमजोर कर दिया जिसके कारण गुलदार,भालू की संख्या में बेहताशा वृद्धि के साथ ही दूसरे वन्य वन्य ज़ीवों की संख्या में भी वृद्धि देखने को मिली है.
सामान्य तौर पर एक गुलदार की टेरिटरी यानि उसकी रेंज क्षेत्र लगभग 13 से 35 वर्ग किलोमीटर तक हो सकती है.ऐसे ही जंगल में दूसरे वन्य-ज़ीवों की टेरिटरी भी निश्चित होती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड के जंगलों में जिस प्रकार भेड़ियों की संख्या कम हुईं है और गुलदार,भालू सहित दूसरे वन्य ज़ीवों की संख्या में बेहताशा वृद्धि हुईं है उसने भी मानव वन्य-जीव संघर्ष को बढ़ाने का काम किया है.
क़ल तक जिस टेरिटरी में एक गुलदार घूम रहा था आज उसी टेरिटरी में 8 से 10 गुलदार और 3 से 4 भालुओं के साथ और दूसरे वन्य ज़ीव भी घूम रहें है,जिनमें समय-समय पर आपस में संघर्ष भी होता रहा है.जंगल के भीतर होंने वाले इस संघर्ष में जों ताकतवर वन्य ज़ीव होता है वह तों जंगल में ही बना रहता है लेकिन जों कमज़ोर होता है वह अपनी जान बचाकर जंगल से सटे रिहायशी इलाको के पास पहुँच जाता है.और यही वन्य ज़ीव फिर मानव वन्य ज़ीव संघर्ष का कारण बनता है.
उत्तराखंड में ठंडे और उच्चाई वाले स्थानों में अधिकतर मिलने वाले भेड़िये उच्च हिमालयी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहें है,जों बंजर भूमि और पहाड़ी जंगलों में रहते है.और
झुंड में शिकार करने के आदि रहें है लेकिन इनकी घटती संख्या नें पहाड़ो में रह रहें लोगों की जान का संकट पैदा कर दिया है.
आज जरुरत है इस पर शोध करने की ताकि कैसे मानव वन्य ज़ीव के बढ़ते संकट को कम किया जा सकें.वरिष्ठ पत्रकार अनिल बहुगुणा भी मानते है कि जिस प्रकार पहाड़ो में गुलदारों और भालुओं की संख्या में बेहताशा वृद्धि हुईं है उसने मानव ज़ीव संघर्ष को कई गुना बढ़ा दिया है.अनिल बहुगुणा बताते है की वन्य ज़ीवों की जंगल के अंदर फूड चेन में आया बदलाव भी इसका एक बहुत बड़ा कारण है,जिसकों गंभीरता से लिया जाना चाहिए.






