उत्तराखंड

जनपद उत्तरकाशी के धराली और हर्षिल में आई तबाही को 7 दिन हो चुके हैं. सेना लगातार राहत और बचाव का काम कर रही है. इस राहत बचाव के काम के लिए सेना ने खास ट्रेंड डॉग की भी तैनाती की है. यह K-9 यूनिट जमीन के नीचे दबे लापता लोगों की तलाश कर रहीं है . डॉग की सूंघने की क्षमता को ट्रेनिंग के जरिए और ज्यादा असरदार बना दिया जाता है. सेना की तरफ से जारी एक वीडियो में आर्मी के सर्च एंड रेस्क्यू डॉग को उनके हैंडलरों के साथ ALH से एयरलिफ्ट करते हुए दिखाया गया है. सेना के मुताबिक फिलहाल 7 सर्च एंड रेस्क्यू में माहिर डॉग मौके पर मौजूद हैं.

स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है डॉग को

आर्मी के असॉल्ट K9 को FIBUA यानी फाइटिंग इन बिल्डअप एरिया, CASO यानी कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशंस, SADO यानी सीक एंड ड्रिस्ट्रॉय ऑपरेशंस, जंगल में सर्च और एरिया सैनिटाइजेशन जैसे स्पेशल टेक्टिकल ऑपरेशंस लिए ट्रेंड किया जाता है. एवेलॉन्च के दौरान बर्फ में दबे सेना के जवानों को भी ढूंढ निकालने में माहिर होते हैं. इसके अलावा लेजर गाइडेड अटैक और वेपन रिट्रीवल जैसी खास क्षमताओं के लिए भी इन्हे ट्रेंड किया जाता है. इससे आर्मी को स्पेशल ऑपरेशंस में काफी मदद मिलती है. इसके अलावा रेडियो गाइडेड डायरेक्शनल कंट्रोल में भी डॉग को ट्रेनिंग दी जाती है. इसमें डॉग के हेड माउंटेड टैक्टिकल कैमरा लगा होता है. इससे लाइव वीडियो ट्रांसमिशन की मदद से रियल टाइम वीडियो सर्विलांस के साथ-साथ छुपकर हमला करने की क्षमता बढ़ जाती है. ये ट्रेंड K9 काउंटर इनसरजेंसी, काउंटर टेररिज्म एरिया में स्पेशल फोर्स के ऑपरेशंस में फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं.

क्या है सेना की K-9 यूनिट?

भारतीय सेना के पास 600 से ज्यादा ट्रेंड डॉग हैं जो कि 25 से ज्यादा डॉग यूनिट में शामिल हैं. हर यूनिट में 24 डॉग होते हैं. इनकी ट्रेनिंग मेरठ के रीमाउंट वेटरिनरी कोर में होती है. छोटी उम्र से इनकी ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. डॉग्स की ट्रेनिंग 36 हफ्ते की होती है. सेना में शामिल होने के बाद 7-8 साल तक अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं और फिर इन्हें रिटायर कर दिया जाता है. डॉग को अलग-अलग ऑपरेशन के लिहाज से ही ट्रेनिंग दी जाती है. इसमें पेट्रोलिंग, गार्ड ड्यूटी, एक्सप्लोसिव को सूंघ कर पता लगाने, ड्रग्स के साथ-साथ दूसरी प्रतिबंधित चीजों का पता लगाने, असॉल्ट ऑपरेशन, एंटी टेररिज्म ऑपरेशन, एवेलॉंच और लैंडस्लाइड रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए ट्रेंड किया जाता है. इस वक्त सेना में लैब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन मैलिनोइस जैसी विदेशी ब्रीड के डॉग शामिल हैं. साल 2016 के बाद से चिप्पीपराई, कोम्बाई, राजापलयम जैसे स्वदेशी ब्रीड के डॉग को भी ट्रेंड करके सेना में शामिल किया जा रहा है.

कोरोना के मरीजों की भी पहचान की थी

भारतीय सेना ने अपने जवानों को कोरोना से बचाने के लिए कई गाइडलाइन के तहत एहतियात भी बरती थी. बावजूद इसके मामले सामने आए थे. इसके बाद सेना ने अपने डॉग यूनिट को भी कोरोना की पहचान करने के लिए तैयार किया था. पेशाब और पसीने के सैंपल को सूंघकर डॉग ने कोरोना पीड़ितों की पहचान की थी. महज 12 हफ्ते की ट्रेनिंग में कुछ ही सेकंड में इन कुत्तों ने कोरोना के सैंपल को पहचानना शुरू कर दिया था. भारतीय सेना के K9 डॉग्स अब तक एक्सप्लोसिव और ड्रग को सूंघकर उसका पता लगाते थे, लेकिन कोरोना की महामारी के चलते इन डॉग्स को विशेष ट्रेनिंग दी गई थी.