पौराणिक मौण मेलें का हुआ आयोजन, हजारों लोगों नें नदी में पकड़ी मछलियां

उत्तराखंड.. देवभूमि उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक विरासत कें साथ ही अपने पौराणिक और अनूठे मेलों कें लिए भी देश दुनिया में विख्यात हैँ. ऐसे ही एक पौराणिक मेंलें सें आज हम आपकों रूबरू करवा रहें हैँ, जिसका आयोजन टिहरी जनपद कें मसूरी से लगें जौनपुर विकासखंड क्षेत्र में होता हैँ.इस पौराणिक मेलें का नाम हैँ मौण मेला.जिसका आयोजन आज यानि गुरुवार कें दिन अगलाड़ नदी में किया गया, जिसमें जौनपुर जौनसार रवांई क्षेत्र के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों लोगों ने शिरकत करतें हुए लगभग 3 किलोमीटर के दायरे में अगलाड नदी में हजारों लोगों ने मछलियां पकड़ कर अपनी पौराणिक परम्परा कों बचाये रखा.

मौण मेलें की पौराणिकता

मौण मेलें की ऐतिहासिक की शुरुआत 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने की थी.तब से जौनपुर में निरंतर इस मेले का आयोजन किया जाता है.क्षेत्र के बुजुर्गों का कहना है कि इसमें टिहरी नरेश स्वयं अपने लाव लश्कर एवं रानियों के साथ मौजूद रहते थे.इस पौराणिक मेलें कें प्रति यहां कें लोगों का यह लगाव ही हैँ कि आज भी पौराणिक मौण मेला सैकड़ों वर्षों कें बाद भी आयोजित किया जाता रहा है. इस मेले में टिमरू कें पाउडर को नदी में डालकर मछली पकड़ने की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसमें सबसे अधिक मछलियां पकड़ने वाले को पुरस्कृत भी किया जाता है.

इस बार टिमरू पाउडर तैयार करने की इन गाँवों कों मिली थी जिम्मेदारी

इस बार टिमरू का पाउडर तैयार करने की जिम्मेदारी खिलवाड़ खत की उप पट्टी अठज्यूला के आठ गांवों कांडी मल्ली व तल्ली, सड़ब मल्ली व तल्ली, बेल परोगी तथा मेलगढ़ को दी गई थी.इन गांवों में पिछले 10 दिनों से टिमरू का पाउडर बनाने की प्रक्रिया चल रही थी.

इस तरह होता पौराणिक मौण मेलें का आयोजन

मौण मेलें में जाल कुंडियाला फटियाला और हाथों से मछलियां पकड़ी जाती है. माना जाता है कि टिमरू का पाउडर डालने से जहां नदी साफ होती है वही मछलियां भी कुछ देर के लिए मूर्छित हो जाती है जिसके बाद वह फिर जीवित हो जाती हैं. इस मेलें में बच्चें युवा बुजुर्ग पारंपरिक मछली पकड़ने के औजारों से नदी में उतरते हैं और मछलियां पकड़ते हैं. जिसे प्रसाद स्वरूप मेहमानों को परोसा जाता है. भारत का यह सबसे अनूठा मेला होता है जिसका उद्देश्य पर्यावरण का संरक्षण और नदी की सफाई करना होता है ताकि मछलियों को प्रजनन के लिए साफ पानी मिल सके.इस अवसर पर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्त्ता सुनील सिलवाल ने बताया कि यह जौनपुर की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है इसमें जौनपुर के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों से लोग आते हैं और इस मेले का आनंद लेते हैं.