उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है. इसने इंसानों के साथ ही वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की चिंता भी बढ़ा दी है. वन्यजीवों के इंसानों के साथ संघर्ष को लेकर ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो डेंजर जोन में तब्दील हो गए हैं. हालांकि इसके पीछे काफी हद तक इंसान ही जिम्मेदार है. लेकिन जिस तरह स्थितियां बदल रही हैं, उसके चलते राज्य के कई क्षेत्रों में मानव वन्य जीव संघर्ष की आशंकाएं बढ़ गई हैं और यह क्षेत्र संवेदनशील क्षेत्रों में गिने जाने लगे हैं. वन विभाग ने उत्तराखंड में करीब 800 ऐसे इलाके चिन्हित किए हैं, जिन्हें मानव वन्यजीव संघर्ष के लिहाज से डेंजर जोन माना जा सकता है.
उत्तराखंड में बढ़ता जा रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष की समस्या समय के साथ लगातार गंभीर होती जा रही है. पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों, मानव बस्तियों के तेजी से बढ़ते विस्तार और वनों के सिमटते दायरे ने वन्य जीवों को इंसानी बस्तियों के नजदीक लाकर खड़ा कर दिया है. यही वजह है कि राज्य के कई क्षेत्र अब संवेदनशील या कहें डेंजर जोन के रूप में पहचाने जाने लगे हैं. इन डेंजर जोन में मनुष्यों पर हमले या शिकारी वन्यजीवों की गतिविधियों का खतरा लगातार बना हुआ है.
भालू बने सिरदर्द
इन दिनों भालुओं का आतंक सुर्खियों में जरूर है, लेकिन असलियत यह है कि प्रदेश के कई हिस्सों में सिर्फ भालू ही नहीं बल्कि गुलदार, बाघ और हाथी भी बड़े पैमाने पर मनुष्यों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं. चिंतित करने वाली बात ये है कि भालुओं के हमले भी काफी बढ़ गए हैं. वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ते संघर्ष के पीछे इंसानों की गलतियां और वनों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप भी एक महत्वपूर्ण कारण है.
बढ़ते जा रहे हैं भालुओं के हमले
अगर भालुओं की बात करें तो उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों से इनके हमले तेजी से बढ़े हैं. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में अब तक भालुओं ने 74 लोगों पर हमले किए हैं. इन हमलों में 5 लोगों ने जान गंवाई है. 69 लोग घायल हुए हैं.
भालुओं को लेकर चार बड़े डेंजर जोन चिन्हित
उत्तराखंड में भालुओं को लेकर खौफनाक जोन के रूप में कई क्षेत्र विकसित हुए हैं. इनमें बदरीनाथ फॉरेस्ट डिवीजन, पौड़ी फॉरेस्ट डिवीजन, रुद्रप्रयाग फॉरेस्ट डिवीजन और नंदा देवी फॉरेस्ट डिवीजन चार बड़े डेंजर जोन के रूप में चिन्हित किए गए हैं.
यहां भी भालुओं का आतंक
इसके अलावा केदारनाथ और लैंसडाउन के इलाकों में भी भालुओं का आतंक काफी अधिक है. विशेषज्ञ बताते हैं कि ऊंचाई वाले इलाकों में भोजन की उपलब्धता घटने के बाद भालू अक्सर मानव बस्तियों की ओर रुख करते हैं. खासतौर पर सर्दियों के मौसम में यह खतरा और बढ़ जाता है. सर्दी के 6-7 महीने भालुओं के लिए लिहाज से संवेदनशील हैं.
कुमाऊं और गढ़वाल दोनों जगह बाघों के हमले का खतरा ज्यादा
टाइगर के लिहाज से उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील माना जा रहा है. यहां कई इलाके ऐसे हैं, जहां बाघों का मानव बस्तियों के नज़दीक आना आम बात हो गई है. दरअसल जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क नैनीताल जिले में है. इसका विस्तार अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों में भी है. यहां कॉर्बेट टाइगर रिजर्व है. सीटीआर में बाघ रहते हैं. बाघ टाइगर रिजर्व से बाहर निकल आते हैं. इसी दौरान जंगल में घास लेने आई महिलाओं और काम से निकले लोगों पर हमला कर देते हैं. गढ़वाल में भी राजाजी टाइगर रिजर्व होने के कारण बाघ का खतरा बना रहता है.
बाघ के हमलों को लेकर संवेदनशील हैं ये 5 इलाके
बाघों के डेंजर जोन के रूप में पहचाने गए प्रमुख क्षेत्रों में अधिकतर कुमाऊं में ही हैं. हालांकि मुख्य रूप से 5 क्षेत्रों को देखें तो इसमें गढ़वाल में दो और कुमाऊं में 3 डिवीजन बाघों के खतरे को लेकर संवेदनशील हैं. इनमें कुमाऊं मंडल में तराई ईस्ट फॉरेस्ट डिवीजन, तराई वेस्ट फॉरेस्ट डिवीजन, रामनगर फॉरेस्ट डिवीजन हैं. गढ़वाल मंडल में देहरादून का राजाजी टाइगर रिजर्व से सटा क्षेत्र और लैंसडाउन वन प्रभाग का कुछ हिस्सा है.
बाघों के हमले में इस वर्ष 12 लोग गंवा चुके जान
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2025 में अब तक बाघ 12 लोगों की जान ले चुके हैं. इनके हमले में 5 लोग घायल भी हुए हैं. रामनगर और तराई क्षेत्रों में जंगलों के किनारे बसी मानव बस्तियों की बढ़ती आबादी ने इस संघर्ष को और गंभीर बना दिया है. दरअसल इन लोगों की रोजमर्रा जीवन के उपयोग से जुड़ी चीजें जैसे जानवरों के लिए घास, चूल्हे की लकड़ी आदि इन वनों से मिलती है. इसी कारण यहां बाघ के हमले बढ़े हैं.
मैदान से लेकर पहाड़ तक गुलदार की दहशत
उत्तराखंड में गुलदार को लेकर हर जगह भय का माहौल है. मैदान से लेकर पहाड़ तक गुलदार ने आतंक फैला रखा है. चौंकाने वाली बात ये है कि राज्य के सभी 13 जिलों में गुलदार ने अपनी आमद दर्ज कराई है. इसी कारण गुलदार के हमलों के लिहाज से पूरा उत्तराखंड संवेदनशील है.
इन डिवीजनों में हैं गुलदार के डेंजर जोन
डिवीजन स्तर पर देखें तो उत्तराखंड के इन क्षेत्रों को गुलदार के हमलों के लिहाज से सबसे अधिक खौफनाक या डेंजर जोन माना गया है. इनमें अल्मोड़ा फॉरेस्ट डिवीजन, पौड़ी फॉरेस्ट डिवीजन, बागेश्वर का कुछ हिस्सा, चंपावत, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों के कई क्षेत्र शामिल हैं.
गुलदार के हमलों में इस साल 12 लोग गंवा चुके जान
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 2025 में अब तक गुलदार के हमलों में 12 लोगों की जान गई है. 88 लोग गुलदार के घातक हमलों में घायल हो चुके हैं. गुलदार के हमले ज्यादातर उन जगहों पर होते हैं, जहां जंगलों के आसपास कृषि भूमि या गांव बसे हुए हैं. भोजन की तलाश में जंगल का ये शिकारी अक्सर इंसानी बस्तियों में घुस आता है.
मानव–वन्य जीव संघर्ष बढ़ने के पीछे इंसानों की भूमिका
मानव वन्य जीव संघर्ष बढ़ने के पीछे इंसानों की गलतियां भी प्रमुख कारण हैं. लोग अक्सर जंगलों में खुले में कूड़ा फेंकते हैं. भोजन की गंध से आकर्षित होकर जानवर बस्तियों में आते हैं. कई इलाकों में जंगलों का कटाव और अवैध गतिविधियां बढ़ी हैं. खेतों में छोड़े गए मवेशियों के शवों से भी जंगल के शिकारी जानवर आकर्षित होते हैं.पिछले कुछ वर्षों में जिस गति से मानव बस्तियां फैल रही हैं, उसी अनुपात में संघर्ष के संभावित क्षेत्रों की संख्या बढ़ती जा रही है.
वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर बनाई रणनीति
पीसीसीएफ (Principal Chief Conservator of Forests) आरके मिश्रा बताते हैं कि-उत्तराखंड के ऐसे सभी संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित कर लिया गया है, जहां मानव–वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं अधिक हो रही हैं. विभाग लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है. इसके साथ ही कई क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों को बढ़ाया भी गया है.
सांप और ततैया भी हमलावर
बाघ, गुलदार और भालू के अलावा मानव का अन्य 3 प्राणियों से भी संघर्ष चल रहा है. इन तीन प्राणियों में हाथी, सांप और ततैया हैं. हाथी आए दिन आबादी वाले इलाकों में घुसकर उत्पात मचा रहे हैं. सांपों के हमलों का आलम ये है कि 2020 से जुलाई 2025 तक सिर्फ तीन वन डिवीजन रामनगर वन प्रभाग, तराई पश्चिमी वन प्रभाग और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में ही 109 घटनाएं हो चुकी हैं. सर्पदंश की इन घटनाओं में 16 लोगों की जान जा चुकी है. पूरे उत्तराखंड की बात करें तो पिछले 3 साल में ही सर्पदंश से 85 लोगों की हुई मौत और 369 लोग हुए घायल हुए हैं.
ततैया ले चुकी कई लोगों की जान
इसके साथ ही उत्तराखंड में ततैया का भी आतंक है. आलम ये है कि ततैया के काटने से अनेक लोग जहां जान गंवा चुके हैं, वहीं कई लोग घायल हुए हैं. यहां तक कि सरकार को ततैया के काटने पर मुआवजा देने की घोषणा तक करनी पड़ी थी. मधुमक्खी और ततैया के काटने पर साधारण घायल होने की स्थिति में ₹15,000 की राहत राशि मिल रही थी. गंभीर घायल होने पर एक लाख का मुआवजा मिलता था. आंशिक रूप से अपंग होने पर भी ₹100,000 की मदद मिलती थी. पूर्ण रूप से अपंग होने पर 3 लाख की मदद का प्रावधान था. मृत्यु होने की स्थिति में 6 लाख रुपए का हर्जाना सरकार देती थी.
वन्य जीव हमले में मृतक के परिजनों को 10 लाख का मुआवजा
बुधवार 27 नवंबर 2025 को हुई धामी कैबिनेट की बैठक में सरकार ने इस मुआवजे की राशि में परिवर्तन किया है. कैबिनेट ने जो फैसला लिया, उसके अनुसार अब मानव-वन्यजीव संघर्ष में मौत होने पर पीड़ित परिवार को 10 लाख का मुआवजा मिलेगा. यही नहीं अब मानव वन्य जीव संघर्ष में घायल होने वाले लोगों का इलाज सरकार निशुल्क कराएगी.





