कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में हुईं अवैध गतिविधियों को लेकर इसलिए दिए हाईकोर्ट ने सीबीआई जाँच के आदेश

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पाखरों और मोरघट्टी में टाइगर सफारी के नाम पर हुए हजारों पेड़ों के अवैध पातन, अवैध निर्माण और करोड़ों की वित्तीय अनियमिताओं की सीबीआई जाँच करेंगी. पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के नाम सें प्रसारित टाइगर सफारी को लेकर जिस प्रकार पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत के कार्यकाल के दौरान वन विभाग के आलाधिकारियों ने वन कानूनों को ताक पर रखकर यह खेल खेला उसकों लेकर हाईकोर्ट नैनीताल ने इसकी सीबीआई सें जाँच करवाने का फैसला किया है. देहरादून निवासी अनु पंत ने नैनीताल हाईकोर्ट में जों जनहित याचिका दायर की थी कोर्ट ने उस पर सुनवाई के दौरान फैसला सुनाया. हाईकोर्ट ने अपने फैसलें में साफ कहा है कि अभी तक की जांचों सें साफ हों जाता है कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पाखरों और मोरघट्टी के जंगलो में सड़कों और अवैध इमारतों के निर्माण की अनुमति देनें के लिए वन अधिकारियों ने सरकारी रिकॉर्ड में जालसाजी की.

क्या कुछ कहा मुख्य न्यायधीश विपिन सांघी और जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की पीठ ने..

“हम संतुष्ट हैं कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा जांच की मांग करने वाले मामले का खुलासा करती है।”

आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल कुछ अधिकारियों को निलंबित करना और उन्हें आरोप पत्र देकर मामले को लंबित रखना “किसी भी तरह से ठोस कार्रवाई के दायरे में नहीं आता है।”
यह आदेश स्वत: संज्ञान जनहित याचिका के जवाब में आया। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण के मामले में और अनु पंत द्वारा वकील अभिजय नेगी के माध्यम से याचिका दायर की गई थी।
न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की एक समिति ने पाया था कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में सड़कों और इमारतों के अवैध निर्माण की अनुमति देने के लिए, वन अधिकारियों ने सरकारी रिकॉर्ड में जालसाजी की।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक और कॉर्बेट नेशनल पार्क के निदेशक की टीम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार सभी अवैध निर्माण गतिविधियां डीएफओ, कालागढ़ टाइगर रिजर्व डिवीजन के कार्यालय के निर्देशन में की गईं।

न्यायालय ने कहा,

“राज्य सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षक है। राज्य सभी सार्वजनिक संपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों का ट्रस्टी है। एक ट्रस्टी के रूप में राज्य इन प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए सार्वजनिक ट्रस्ट के सिद्धांत के तहत एक कानूनी कर्तव्य है।”

पीठ ने कहा, “भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार काटे गए पेड़ों की कुल संख्या 6093 होने का अनुमान है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि एनजीटी द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासनिक भवन, आंतरिक सड़कों, सर्विस रोड, गार्ड हट्स और पशु होल्डिंग क्षेत्र के निर्माण कार्य “बिना किसी प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी और बिना किसी बजटीय प्रावधान के किए गए थे।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि टाइगर सफारी के लिए मंजूरी में निर्धारित सदस्य 163 से अधिक पेड़ों की कटाई की गई है और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत चरण II की मंजूरी के बिना काम शुरू किया गया था।
अवैध कार्यों के लिए डीएफओ, मुख्य वन्यजीव वार्डन और तत्कालीन वन मंत्री सहित कई अधिकारियों को जिम्मेदार पाया गया है।
याचिकाकर्ता के वकील अभिजय नेगी ने प्रस्तुत किया कि “उक्त जांच और रिपोर्ट के बाद भी सरकार द्वारा दोषी अधिकारियों, जो सरकार और वन विभाग के उच्च अधिकारी हैं, के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।”
उपरोक्त के आलोक में न्यायालय ने “कानून के अनुसार उचित और अप्रभावित जांच के लिए” मामले को सीबीआई को भेज दिया।