कोटद्वार। विधानसभा चुनाव से पहले कोटद्वार की भाजपा राजनीति में टिकट को लेकर अंदरूनी समीकरण तेजी से चर्चा में आने लगे हैं.पार्टी के भीतर संभावित दावेदारों के नामों को लेकर चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस बार भाजपा अपने संगठन के स्थानीय नेतृत्व, खासकर जिलाध्यक्ष स्तर के नेताओं पर भरोसा जताएगी या एक बार फिर किसी ऐसे चेहरे को मैदान में उतारेगी जिसकी राजनीतिक जमीन पार्टी संगठन से बाहर या अलग धड़े में मजबूत रही हो.कोटद्वार की राजनीति में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि पिछले चुनावों में भाजपा का टिकट वितरण कई बार स्थानीय संगठन के समीकरणों को बदलता रहा है.
2007 में शैलेंद्र रावत ने जीता था चुनाव
कोटद्वार विधानसभा में वर्ष 2007 में शैलेंद्र सिंह रावत भाजपा के टिकट पर कोटद्वार से विधायक चुने गए थे.उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह नेगी को हराया था.शैलेंद्र रावत का राजनीतिक सफर दुगड्डा ब्लॉक प्रमुख से शुरू हुआ था और वे कोटद्वार की स्थानीय राजनीति में मजबूत चेहरा बनकर उभरे.लेकिन इसके बाद कोटद्वार भाजपा की राजनीति में टिकट को लेकर समीकरण लगातार बदलते रहे.
2017 में जिलाध्यक्षों और स्थानीय दावेदारों के बीच चर्चा, लेकिन टिकट मिला हरक सिंह रावत को
2017 के चुनाव से पहले शैलेंद्र रावत के भाजपा टिकट की चर्चा थी, लेकिन पार्टी ने हरक सिंह रावत को कोटद्वार से मैदान में उतारा.इससे स्थानीय स्तर पर टिकट को लेकर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आईं.बाद में शैलेंद्र रावत कांग्रेस में चले गए.
यह घटनाक्रम इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कोटद्वार में पार्टी संगठन के स्थानीय नेताओं की दावेदारी और चुनाव जिताऊ माने जाने वाले बड़े चेहरों के बीच किस तरह टकराव की स्थिति बनती रही है.
2022 में फिर बदला समीकरण
2022 के विधानसभा चुनाव में हरक सिंह रावत के भाजपा से बाहर जाने के बाद कोटद्वार सीट पर भाजपा के सामने नया चेहरा चुनने की चुनौती थी.उस समय पूर्व जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान, शैलेंद्र बिष्ट, सुमन कोटनाला और अन्य नेताओं के नाम दावेदारों के रूप में चर्चा में थे.लेकिन अंततः भाजपा ने ऋतु खंडूड़ी भूषण को कोटद्वार से टिकट दिया.ऋतु खंडूड़ी इससे पहले यमकेश्वर से विधायक थीं और 2022 में उन्हें कोटद्वार भेजा गया.
यानी पिछले दो विधानसभा चुनावों में कोटद्वार भाजपा की टिकट राजनीति में स्थानीय संगठन से जुड़े दावेदारों के बजाय दूसरे मजबूत राजनीतिक चेहरों को प्राथमिकता मिलने की तस्वीर दिखाई देती है.
जिलाध्यक्ष संगठन संभालते रहे, लेकिन टिकट की दौड़ में दरकिनार किए गए
यही सवाल अब एक बार फिर भाजपा के भीतर उठ रहा है.पार्टी जिलाध्यक्ष को संगठन चलाने की जिम्मेदारी तो देती है, लेकिन विधायक का टिकट देने के मामले में उस पर उतना भरोसा नहीं करती?भाजपा के पूर्व में जिलाध्यक्ष रहें महावीर कुकरेती,गोविंद सिंह बिष्ट,राजेश ध्यानी,हरेंद्र पाल,धीरेन्द्र चौहान,शैलेन्द्र सिंह बिष्ट,सम्पत सिंह और वीरेंद्र रावत कुछ ऐसे नाम रहें हैं जिन्हें पार्टी नें संगठन की बड़ी जिम्मेदारी तो दी लेकिन ज़ब विधायक के टिकट की बारी आई तो इनको दरकिनार क़र किसी और कों टिकट दे दिया.कोटद्वार के साथ हीं पौड़ी की विधानसभाओं के पिछले चुनावों का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि जिलाध्यक्ष या पूर्व जिलाध्यक्ष दावेदारी तो करतें हैं लेकिन टिकट के मामले में यह पिछड़ जाते हैं.2022 में भी कोटद्वार से टिकट के संभावित नामों में पूर्व जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान का नाम सामने आया था, लेकिन पार्टी ने ऋतु खंडूड़ी को प्रत्याशी बनाया.
पैनल में नाम आने से लेकर टिकट मिलने तक लंबा फासला
भाजपा की चुनावी प्रक्रिया में संभावित दावेदारों के नामों का पैनल तैयार होना और अंतिम प्रत्याशी घोषित होना दो अलग-अलग चरण हैं.कोटद्वार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि पैनल में नाम होना टिकट की गारंटी नहीं है.यही वजह है कि इस बार भी संगठन से जुड़े कई नेताओं की सक्रियता को टिकट की दौड़ से जोड़कर देखा जा रहा है.
गुटबाजी भी बन सकती है बड़ी चुनौती
कोटद्वार भाजपा में टिकट की चर्चा के साथ पार्टी के अंदर गुटीय राजनीति का मुद्दा भी सामने आता रहा है.अलग-अलग समय में स्थानीय नेताओं के अपने-अपने समर्थक समूह रहे हैं.जिलाध्यक्ष के सामने संगठन को एकजुट रखने के साथ-साथ विभिन्न गुटों को साधने की चुनौती रहती है.
राजनीतिक विश्लेषण यह भी है कि कुछ जिलाध्यक्ष संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाने के दौरान अपने समर्थक समूह तो तैयार कर लेते हैं,लेकिन उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत व्यक्तिगत जनाधार में बदलना आसान नहीं होता.ऐसे में संगठन का पद खत्म होने के बाद कुछ नेता राजनीतिक रूप से हाशिये पर भी चले जाते हैं.
अब बड़ा सवाल—2027 में किस पर दांव लगाएगी भाजपा?
उत्तराखंड की 70 सदस्यीय विधानसभा में कोटद्वार एक महत्वपूर्ण सीट है।.2022 में भाजपा ने ऋतु खंडूड़ी को यहां से मैदान में उतारा और उन्होंने कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी को हराया.
अब अगले विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा स्थानीय संगठन के किसी चेहरे पर भरोसा करेगी?
या फिर एक बार फिर ऐसा चेहरा उतारेगी जिसकी व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ पार्टी संगठन से बड़ी हो?
कोटद्वार में टिकट की यह लड़ाई सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं होगी.यह इस बात का भी संकेत देगी कि भाजपा स्थानीय संगठन और चुनावी चेहरे के बीच संतुलन कैसे बनाती है.
और सबसे अहम सवाल यही रहेगा—क्या इस बार भाजपा के जिलाध्यक्ष या संगठन से लंबे समय से जुड़े किसी स्थानीय नेता को विधायक बनने की राजनीतिक जमीन मिलेगी, या टिकट की अंतिम मुहर फिर किसी बड़े चुनावी चेहरे के नाम पर लगेगी?






