लैंसडाउन। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पहाड़ की सियासत में संभावित मुकाबलों की चर्चाएं तेज हो गई हैं. लैंसडाउन विधानसभा सीट पर यदि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना और भाजपा के मौजूदा विधायक दिलीप सिंह रावत आमने-सामने आते हैं,तो मुकाबला बेहद दिलचस्प होने के साथ-साथ कई पुराने राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा भी बन सकता है.2022 में दिलीप सिंह रावत ने भाजपा के टिकट पर 24,504 वोट हासिल कर कांग्रेस की अनुकृति गुसाईं को 9,868 वोटों के बड़े अंतर से हराया था. यानी आंकड़ों के लिहाज से भाजपा की स्थिति मजबूत रही है.लेकिन ज़ब सामने कांग्रेस के सूर्यकान्त धस्माना होंगे तो 2027 का चुनाव सिर्फ पिछले चुनाव के आंकड़ों से तय नहीं होगा बल्कि धस्माना के राजनीतिक अनुभव और आक्रामक अंदाज से भाजपा कों पार पाना होगा,जों फिलहाल आसान नजर नहीं आता,क्योंकि उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर जानी जाती है, जो चुनावी मैदान में आक्रामक अंदाज के साथ उतरते हैं और जनता से जुड़े मुद्दों को खुलकर उठाते है.धस्माना की राजनीति का सबसे बड़ा पहलू उनका सीधा और मुखर तेवर है. सरकार हो या विपक्ष, वह अपने राजनीतिक विरोधियों पर सवाल उठाने में पीछे नहीं रहते. यही अंदाज उन्हें चुनावी मुकाबले में दूसरे नेताओं से अलग पहचान देता है.
आक्रामक तेवर और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाते हैं सूर्यकांत धस्माना
उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी है, जो चुनावी मैदान में आक्रामक तेवरों के साथ उतरते हैं और जनता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने के लिए जाने जाते हैं.धस्माना की राजनीति का सबसे बड़ा पक्ष उनका सीधा, मुखर और बेबाक अंदाज है. सरकार हो या राजनीतिक विरोधी, जनहित से जुड़े सवालों पर वह खुलकर अपनी बात रखते हैं और मुद्दों को सीधे जनता के बीच ले जाने में विश्वास रखते हैं.उनकी राजनीतिक शैली में हमलावर तेवर के साथ मुद्दों की स्पष्टता दिखाई देती है.यही वजह है कि चुनावी मुकाबले में धस्माना सिर्फ प्रत्याशी के तौर पर नहीं, बल्कि विपक्ष की मजबूत आवाज के रूप में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करते हैं.2027 में यदि लैंसडाउन विधानसभा से धस्माना चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो उनका यही आक्रामक अंदाज भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है. खासकर ऐसे समय में जब स्थानीय स्तर पर विकास, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को लेकर जनता के बीच सवाल मौजूद हैं.
लैंसडाउन में उनका मुकाबला यदि भाजपा के तीन बार के विधायक दिलीप सिंह रावत से होता है, तो यह चुनाव राजनीतिक अनुभव और मजबूत संगठन बनाम आक्रामक विपक्षी चुनौती के बीच दिलचस्प मुकाबला बन सकता है.
लैंसडाउन विधानसभा की राजनीति में रावत परिवार की रही है मजबूत पकड़
लैंसडाउन विधानसभा की राजनीति में दिलीप सिंह रावत के परिवार का प्रभाव लंबा रहा है. भारत सिंह रावत पांच बार लैंसडाउन से विधायक रहे, जबकि उनके बाद दिलीप सिंह रावत ने भी लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है.यानी लैंसडाउन में इस परिवार की राजनीतिक मौजूदगी कई दशकों से रही है. यही मजबूत जनाधार और चुनावी नेटवर्क भाजपा के लिए सबसे बड़ी ताकत माना जाता है.
विरासत बनाम आक्रामक चुनौती
अगर 2027 में सूर्यकांत धस्माना और दिलीप सिंह रावत आमने-सामने आते हैं, तो मुकाबला दिलचस्प होगा. एक तरफ करीब पांच दशक की राजनीतिक विरासत, मजबूत संगठन और लगातार तीन चुनाव जीतने का अनुभव होगा, तो दूसरी तरफ धस्माना का आक्रामक तेवर, राजनीतिक अनुभव और मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति.ऐसे में लैंसडाउन का चुनाव “राजनीतिक विरासत बनाम बदलाव की चुनौती” का मुकाबला बन सकता है.
लेकिन लंबे समय से एक ही राजनीतिक परिवार के प्रभाव के बावजूद लैंसडाउन क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल आज भी चुनावी बहस का हिस्सा बने हुए है.यही वह मोर्चा होगा जहां धस्माना भाजपा की पुरानी राजनीतिक पकड़ को चुनौती देने की कोशिश कर सकते हैं.
क्या धस्माना बदल पाएंगे लैंसडाउन का चुनावी समीकरण?
लैंसडाउन की राजनीति में लंबे समय से एक मजबूत राजनीतिक परिवार का प्रभाव रहा है.ऐसे में धस्माना यदि कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरते हैं तो उनके सामने केवल भाजपा प्रत्याशी को हराने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि वर्षों से बने राजनीतिक समीकरणों को बदलने की भी चुनौती होगी.धस्माना का आक्रामक चुनावी अंदाज, स्थानीय मुद्दों पर सीधा हमला और जनता के बीच मजबूत चुनावी अभियान इस मुकाबले को रोचक बना सकता है.
लैंसडाउन की राजनीति में भारत सिंह रावत के परिवार का नाम लंबे राजनीतिक प्रभाव के साथ जुड़ा रहा है. भारत सिंह रावत के नाम लैंसडाउन से 1974, 1977, 1989, 1991 और 1996 की चुनावी जीत दर्ज हैं,जबकि वर्तमान विधायक दिलीप सिंह रावत जों भारत सिंह रावत के पुत्र हैं वह भी 2012,2017 और 2022 में लगातार तीन बार लैंसडाउन से जीत क़र राज्य विधानसभा पहुंच चुके है.यही वजह है कि 2027 में यदि धस्माना सामने आते हैं तो मुकाबला केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा, बल्कि लंबी राजनीतिक विरासत बनाम बदलाव की राजनीति के रूप में भी देखा जा सकता है.
लैंसडाउन विधानसभा सीट के बारे में क्या कहते है राजनीतिक विश्लेषक
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक विपिन उनियाल की यदि मानें तो लैंसडाउन में यदि सूर्यकान्त धस्माना का मुकाबला भाजपा के तीन बार के विधायक दिलीप सिंह रावत से होता है, तो चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है.विपिन उनियाल का मानना है कि एक तरफ भाजपा का मजबूत संगठन, तीन चुनावों की जीत और राजनीतिक अनुभव होगा, तो दूसरी तरफ धस्माना का आक्रामक चुनावी अंदाज, राजनीतिक अनुभव और क्षेत्र में मजबूत पकड़ कांग्रेस के लिए बड़ा हथियार बन सकती है.
विपिन उनियाल की यदि मानें तो लगातार तीन बार दिलीप रावत के विधायक रहने के बाद स्वाभाविक रूप से जनता की अपेक्षाएं काफी बढ़ जाती हैं. विपक्ष के लिए यह सवाल उठाना आसान होगा कि लंबे प्रतिनिधित्व के बावजूद क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं का समाधान कितना हुआ.उधर दूसरी ओर अतीत में दिलीप रावत ने अपनी ही सरकार के मंत्रियों और विभागों के कामकाज पर सवाल उठाए हैं. 2021 में उन्होंने क्षेत्र की कथित उपेक्षा को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा और आंदोलन की चेतावनी तक दी थी.यह उनकी स्वतंत्र राजनीतिक शैली भी हो सकती है, लेकिन विपक्ष इसे “सरकार और विधायक के बीच तालमेल की कमी” के रूप में पेश कर सकता है.खुद राजनीति के जानकार भी मानते है कि लैंसडाउन से लगातार तीन बार जीतने वाले भाजपा विधायक दिलीप रावत के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव इतना आसान नहीं है और वो भी तब ज़ब सामने सूर्यकान्त धस्माना जैसा कांग्रेस का कद्दावर नेता हो.





