लकड़ी पड़ाव की 62 बीघा ज़मीन का बड़ा खुलासा,भाजपा के हिन्दू मुश्लिम कार्ड की धार होगी अब कमज़ोर

कोटद्वार। उत्तराखंड की राजनीति में कोटद्वार का लकड़ी पड़ाव एक बार फिर सुर्खियों में है.यहां 62 बीघा भूमि पर कथित अवैध अतिक्रमण को लेकर सामने आए आरटीआई संबंधी दावों ने स्थानीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है.जिस मुद्दे को भाजपा ने अलग-अलग चुनावों में जोर-शोर से उठाया और कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों के कब्जे से जोड़कर जनता के सामने रखा, अब उसी मामले में कब्जाधारकों की धार्मिक पहचान और राजनीतिक संबंधों को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं.
आरटीआई से सामने आई जानकारी के हवाले से दावा किया जा रहा है कि इस भूमि पर कथित अवैध कब्जों में लगभग 90 फीसदी कब्जे हिंदू समुदाय के लोगों के हैं.यदि उपलब्ध दस्तावेजों से इन दावों की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन राजनीतिक आरोपों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करेगा, जिनके जरिए इस मुद्दे को चुनावी बहस का हिस्सा बनाया जाता रहा है.

चुनाव में मुस्लिम कब्जों का मुद्दा, अब सभी कब्जाधारकों पर कार्रवाई की मांग क्यों नहीं?

लकड़ी पड़ाव की जमीन का मामला लंबे समय से राजनीतिक चर्चाओं में रहा है.भाजपा ने इस मुद्दे को चुनावी मंचों पर उठाते हुए कथित कब्जों को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर पेश किया.इसके चलते यह मामला भूमि और अतिक्रमण के सवाल से आगे बढ़कर हिंदू-मुस्लिम राजनीति की बहस का हिस्सा भी बनता रहा.
लेकिन अब आरटीआई के हवाले से किए जा रहे दावे एक अलग तस्वीर सामने रख रहे हैं.यदि कब्जाधारकों में विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के नाम दर्ज हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि अतिक्रमण के मामले में कार्रवाई का आधार धार्मिक पहचान होगी या जमीन से जुड़े दस्तावेज और कानून?
किसी भी सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप हो,तो उसकी जांच निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए.कानून का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए, चाहे संबंधित व्यक्ति किसी भी धर्म, दल या राजनीतिक प्रभाव से जुड़ा हो.

भाजपा विधायक महंत दिलीप रावत का नाम भी शामिल होने का दावा

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा उस दावे को लेकर हो रही है, जिसमें भाजपा विधायक महंत दिलीप रावत का नाम भी कथित कब्जाधारकों में शामिल बताया जा रहा है.इसके साथ ही अन्य रसूखदार लोगों तथा भाजपा, कांग्रेस और कुछ दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों के नाम होने की बात भी कही जा रही है.हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित आरटीआई दस्तावेजों, भूमि अभिलेखों और आधिकारिक जांच से किया जाना जरूरी है.किसी सूची में नाम होने मात्र से किसी व्यक्ति के खिलाफ अवैध कब्जे का आरोप स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता.यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सूची किस विभाग ने तैयार की, उसमें दर्ज जमीन का स्वामित्व क्या है और संबंधित व्यक्तियों का वास्तविक कब्जा किस प्रकृति का है.खुद लैंसडाउन से भाजपा विधायक दिलीप रावत भी इस बात कों कह चुके हैं कि लकड़ी पड़ाव में अवैध अतिक्रमण से उनका कोई लेना देना नहीँ हैं,लेकिन इस बात की भी जाँच आवश्यक हैं कि आखिर कैसे भाजपा विधायक दिलीप रावत कों क्योँ अवैध अतिक्रमणकारी इस रिपोर्ट में घोषित किया गया.यदि दस्तावेजों में जनप्रतिनिधियों या प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आते हैं, तो प्रशासन को तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए.जनप्रतिनिधियों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे मामलों में पारदर्शिता के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करें.

भाजपा की चुनावी रणनीति के सामने नई चुनौती

कोटद्वार की राजनीति में लकड़ी पड़ाव का मुद्दा केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय भी बन चुका है.चुनाव के दौरान किसी एक समुदाय को केंद्र में रखकर इस मुद्दे को उठाया जाता रहा हो, तो अब कथित कब्जाधारकों की पूरी सूची और वास्तविक स्थिति सार्वजनिक होना महत्वपूर्ण हो जाता है.आरटीआई संबंधी दावों में यदि अलग-अलग समुदायों और राजनीतिक दलों के लोगों के नाम सामने आते हैं, तो भाजपा से यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि क्या उसने पहले इस मामले को सभी कब्जाधारकों के खिलाफ समान कार्रवाई की मांग के रूप में उठाया था,या फिर इसे किसी खास समुदाय से जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई?
यही वह सवाल है, जो आने वाले चुनावों में इस मुद्दे की दिशा तय कर सकता है.विपक्षी दलों को भी केवल राजनीतिक आरोप लगाने के बजाय दस्तावेजों के आधार पर अपनी बात रखनी होगी. आखिरकार, जनता यह जानना चाहेगी कि जमीन पर वास्तविक स्थिति क्या है और अब तक जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की है.

हिंदू-मुस्लिम बहस से आगे बढ़कर जवाबदेही का सवाल

इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अतिक्रमण जैसे प्रशासनिक और कानूनी मामले को धार्मिक पहचान के चश्मे से देखने के बजाय तथ्य और कानून के आधार पर परखा जाए.
यदि किसी जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है,तो उसका निर्धारण राजस्व अभिलेखों, स्वामित्व दस्तावेजों, सीमांकन और सक्षम प्राधिकारी की जांच से होना चाहिए.केवल किसी व्यक्ति का धर्म या राजनीतिक जुड़ाव यह तय नहीं कर सकता कि वह दोषी है या निर्दोष.
लकड़ी पड़ाव की भूमि पर कथित अतिक्रमण को लेकर उठे सवाल प्रशासन के लिए भी परीक्षा हैं.क्या पूरी भूमि का सीमांकन कराया जाएगा? क्या कथित कब्जाधारकों की सूची सार्वजनिक की जाएगी? क्या सभी मामलों में एक समान कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी? और क्या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों की भी उसी निष्पक्षता से जांच होगी?
इन सवालों के जवाब ही इस पूरे प्रकरण की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट करेंगे।

जनता पूछ रही है—62 बीघा जमीन का पूरा सच कब आएगा सामने?

कोटद्वार में अब बहस इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि 62 बीघा भूमि का वास्तविक स्वामित्व क्या है, कितने लोगों के नाम दस्तावेजों में दर्ज हैं और कथित अतिक्रमण के मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
यदि आरटीआई से संबंधित दावे सही साबित होते हैं, तो राजनीतिक दलों को अपने पुराने बयानों और आरोपों पर जवाब देना पड़ सकता है. वहीं, यदि कुछ नामों या आंकड़ों को लेकर भ्रम है, तो प्रशासन और संबंधित विभागों को उसे दूर करना चाहिए।
फिलहाल लकड़ी पड़ाव का मामला भाजपा के पुराने चुनावी दावों पर सवाल उठाने का अवसर जरूर बन गया है, लेकिन इसका अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए. कोटद्वार की जनता को राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर जमीन का पूरा सच, जिम्मेदार लोगों की पहचान और कानून के मुताबिक कार्रवाई चाहिए. यही इस मामले की सबसे बड़ी कसौटी होगी.