उत्तराखंड | देहरादून | 22 अक्टूबर हिमांशु बडोनी
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की आहट के साथ ही सियासी बिसात बिछने लगी है.राष्ट्रीय दलों के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिशों के बीच अब क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट करने की चर्चा भी तेज हो रही है.इसी कड़ी में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के वरिष्ठ नेता महेन्द्र सिंह रावत ने बड़ा बयान देते हुए उन क्षेत्रीय दलों को यूकेडी के साथ आने का न्योता दिया है, जिनके पास अपना चुनाव चिह्न नहीं है, लेकिन वे अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार रखते हैं.
महेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि ऐसे क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल के साथ मिलकर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं.वे यूकेडी के चुनाव चिह्न ‘कुर्सी’ पर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं.उनके इस बयान को 2027 के चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल बढ़ाने और एक साझा राजनीतिक विकल्प तैयार करने की संभावित पहल के रूप में देखा जा रहा है.
‘कुर्सी’ के सहारे क्षेत्रीय एकजुटता की रणनीति!
उत्तराखंड क्रांति दल राज्य आंदोलन से जुड़ी अपनी राजनीतिक पहचान को फिर मजबूत करने की कोशिश में जुटा है.ऐसे में दूसरे क्षेत्रीय दलों के लिए अपने दरवाजे खोलने का संदेश पार्टी की चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.यदि मजबूत स्थानीय जनाधार वाले दल यूकेडी के साथ आते हैं, तो विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दों को साझा मंच पर उठाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
राज्य में बेरोजगारी, पलायन, पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, स्थानीय युवाओं के रोजगार और मूल निवास जैसे मुद्दे क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं.इन सवालों को लेकर अलग-अलग स्तर पर सक्रिय क्षेत्रीय संगठनों और दलों के बीच चुनावी तालमेल बनता है या नहीं, इस पर अब राजनीतिक निगाहें रहेंगी.
क्या 2027 में बनेगा तीसरा राजनीतिक विकल्प?
उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला प्रमुख रहा है.ऐसे में यूकेडी यदि दूसरे क्षेत्रीय दलों को साथ लाने में सफल होती है, तो वह आगामी चुनाव में क्षेत्रीय विकल्प को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है.हालांकि, इस संभावित एकजुटता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्षेत्रीय दल साझा नेतृत्व, सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति पर किस तरह सहमति बनाते हैं.
महेन्द्र सिंह रावत के बयान ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है.अब सवाल यह है कि क्या मजबूत स्थानीय जनाधार वाले क्षेत्रीय दल यूकेडी के प्रस्ताव पर आगे आएंगे और क्या ‘कुर्सी’ का चुनाव चिह्न 2027 में क्षेत्रीय ताकतों को एक मंच पर लाने का आधार बन पाएगा?
मिशन-2027 में यूकेडी की चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि बिखरी हुई क्षेत्रीय ताकतों को एक साझा राजनीतिक दिशा देने की भी होगी.






