कोटद्वार। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही कोटद्वार की सियासत में हलचल तेज होने लगी है.विधानसभा अध्यक्ष एवं कोटद्वार विधायक ऋतु खंडूड़ी भूषण के सामने अब केवल विपक्ष की चुनौती नहीं,बल्कि अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने और पार्टी संगठन के साथ बेहतर तालमेल बनाने की भी परीक्षा है.सवाल यह है कि क्या वह अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल को जनता के बीच प्रभावी ढंग से रख पाएंगी या चुनाव नजदीक आते-आते उनकी राह और कठिन होगी?
स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच विधायक के कामकाज, भाजपा कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेताओं की चुनावी तैयारियों और संभावित भीतरघात की चर्चाओं ने कोटद्वार की राजनीति को दिलचस्प बना दिया है.
साढ़े चार साल का कार्यकाल, जनता तक कितना पहुंचा विकास का संदेश?
ऋतु खंडूड़ी भूषण के सामने सबसे अहम चुनौती अपने कार्यकाल के दौरान हुए विकास कार्यों का हिसाब जनता के सामने प्रभावी तरीके से रखने की है.केवल योजनाओं की घोषणा या धनराशि स्वीकृत होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मतदाता यह भी देखना चाहते हैं कि उनके मोहल्ले, गांव और क्षेत्र में उन योजनाओं का कितना लाभ पहुंचा.विधायक निधि के आंकड़ों के अनुसार,पिछले चार वित्तीय वर्षों में कोटद्वार में विधायक निधि से 18.73 करोड़ रुपये के 549 विकास कार्य स्वीकृत किए गए.इनमें से 353 कार्य पूरे हुए,जबकि 196 कार्य प्रगति पर बताए गए,यानी स्वीकृत कार्यों में करीब 64 प्रतिशत पूरे हुए थे.
ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि विधायक ने काम नहीं किया, लेकिन यह जरूर बताते हैं कि स्वीकृत योजनाओं को समय पर पूरा कराना और उनकी जानकारी जनता तक पहुंचाना चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है.सवाल यही है कि विकास कार्यों की स्वीकृति और जमीन पर उनके पूरा होने के बीच की दूरी को कैसे कम किया जाएगा?
भाजपा संगठन के साथ तालमेल की परीक्षा
राजनीति में विधायक की ताकत केवल उसके पद से नहीं, बल्कि बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं, मंडल पदाधिकारियों और स्थानीय संगठन के साथ उसके संबंधों से भी तय होती है.कोटद्वार में भाजपा के भीतर संगठन और विधायक के बीच तालमेल को लेकर अक्सर सवाल उठ खड़े होते हैं.राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि विधायक के कार्यक्रमों और उपलब्धियों को पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच जिस स्तर पर प्रचारित होना चाहिए, वैसी सक्रियता दिखाई नहीं देती.सोशल मीडिया पर भी स्थानीय भाजपा नेताओं की ओर से उनके कामकाज के प्रचार को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.हालांकि,सोशल मीडिया पर किसी नेता की चर्चा कम होना अपने आप में संगठन की नाराजगी का प्रमाण नहीं है.यह जानने के लिए पार्टी की बैठकों, बूथ स्तर की गतिविधियों और कार्यकर्ताओं की सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं को देखना जरूरी होता है.फिर भी, यदि चुनाव से पहले संगठन और विधायक के बीच बेहतर समन्वय नहीं बनता, तो इसका असर चुनाव प्रचार और मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर पड़ सकता है.
कोटद्वार में दूसरे भाजपा नेता भी सक्रिय, किसकी तैयारी किसके लिए?
2027 के चुनाव को देखते हुए कोटद्वार में भाजपा के कई नेताओं की राजनीतिक सक्रियता पर नजर रखी जा रही है.पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं और चुनावी संभावनाएं हो सकती हैं.ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सभी नेता मौजूदा विधायक की दावेदारी को मजबूत करने में जुटेंगे या अपने लिए अलग राजनीतिक जमीन तैयार करेंगे?
स्थानीय राजनीति में यह चर्चा भी है कि कुछ नेता अपने समर्थकों और जनसंपर्क के जरिए भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं.लेकिन किसी नेता की सक्रियता को सीधे ऋतु खंडूड़ी भूषण के विरोध या उनकी दावेदारी कमजोर करने की कोशिश से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.भाजपा के लिए असली परीक्षा यह होगी कि चुनाव आते-आते स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पार्टी के सामूहिक चुनावी लक्ष्य के साथ कैसे जोड़ा जाए.
करोड़ों के ठेकों से राजनीतिक समर्थन की गारंटी नहीं
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह दावा भी किया जा रहा है कि जिन लोगों को विधायक के कार्यकाल में करोड़ों रुपये के ठेके मिले, उनमें से कुछ की राजनीतिक सक्रियता सीमित दिखाई देती है.हालांकि, राजनीति का एक अहम पहलू यह है कि विकास कार्यों से जुड़े लोगों का समर्थन हमेशा चुनावी समर्थन में नहीं बदलता.ठेकेदारों, स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों और राजनीतिक समर्थकों के अपने-अपने हित होते है जों चुनावी गुणा भाग का हिस्सा होते है,इसलिए किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए यह मान लेना जोखिम भरा होता है कि जिन लोगों को उसके कार्यकाल में लाभ मिला, वे चुनाव के समय भी उसी के साथ खड़े रहेंगे.राजनीतिक समर्थन का वास्तविक आधार जनता का विश्वास और कार्यकर्ताओं की सक्रियता होती है.
विपक्ष से मुकाबला या अपनों की चुनौती?
कोटद्वार में ऋतु खंडूड़ी भूषण के सामने विपक्ष की चुनौती भी कम महत्वपूर्ण नहीं है.कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी क्षेत्र में एक परिचित राजनीतिक चेहरा हैं.2022 के विधानसभा चुनाव में ऋतु खंडूड़ी भूषण ने भाजपा के टिकट पर 32,103 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी,जबकि सुरेंद्र सिंह नेगी को 28,416 वोट मिले थे और जीत का अंतर 3,687 मतों का रहा था.यह मुकाबला बताता है कि पिछला चुनाव आसान अंतर से नहीं जीता गया था.ऐसे में 2027 के चुनाव में मतदाताओं के रुझान, स्थानीय मुद्दों और दोनों पक्षों की संगठनात्मक तैयारियों की अहम भूमिका होगी.राजनीतिक गलियारों में यह दावा भी सुनाई दे रहा है कि पिछले चुनाव में ऋतु खंडूड़ी के साथ खड़े रहे कुछ लोग अब कांग्रेस के पक्ष में काम कर सकते हैं.लेकिन इसे राजनीतिक चर्चा और संभावित समीकरण के रूप में ही देखा जाना चाहिए.यदि भाजपा के भीतर असंतोष या निष्क्रियता है, तो पार्टी को समय रहते उसे समझना होगा.वहीं, कांग्रेस के लिए भी केवल भाजपा की अंदरूनी चुनौतियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा; उसे जनता के बीच अपना मजबूत विकल्प प्रस्तुत करना होगा.
बीसी खंडूड़ी की राजनीतिक विरासत और भीतरघात की आशंका
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी की राजनीतिक विरासत ऋतु खंडूड़ी भूषण की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है.लेकिन चुनावी राजनीति में पारिवारिक विरासत के साथ-साथ स्थानीय जनाधार,संगठनात्मक एकजुटता और जनता से निरंतर संपर्क भी मायने रखते हैं.
कोटद्वार में उनकी स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कुछ राजनीतिक विश्लेषक भीतरघात की आशंका पर भी चर्चा क़र रहें हैं.चुनाव में पार्टी के भीतर असंतोष तभी निर्णायक बनता है, जब वह टिकट वितरण, प्रचार, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करे.इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भाजपा अपने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को किस तरह एकजुट रखती है.
अब आगे की राह क्या होगी?
ऋतु खंडूड़ी भूषण के लिए आने वाला समय अपने राजनीतिक आधार की समीक्षा करने का अवसर भी है.उन्हें विकास कार्यों की स्थिति जनता के सामने रखनी होगी, अधूरे कार्यों की प्रगति पर स्पष्टता देनी होगी और भाजपा संगठन के साथ सक्रिय संवाद कायम करना होगा.दूसरी ओर, भाजपा नेतृत्व को भी यह देखना होगा कि कोटद्वार में पार्टी की चुनावी तैयारी केवल व्यक्तिगत जनसंपर्क तक सीमित न रहे, बल्कि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की भागीदारी और सामूहिक रणनीति के साथ आगे बढ़े.
कुल मिला क़र यदि देखा जाए तो 2027 की लड़ाई केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगी.यह मौजूदा विधायक के कामकाज, जनता के विश्वास, संगठनात्मक तालमेल और स्थानीय नेताओं की भूमिका की भी परीक्षा होगी.ऋतु खंडूड़ी भूषण के लिए चुनौती यह है कि चुनाव से पहले उठ रहे सवालों का जवाब उपलब्धियों, पारदर्शिता और मजबूत जनसंपर्क से दें.आखिरकार, टिकट का फैसला पार्टी करेगी, लेकिन चुनावी सफलता का आधार जनता का विश्वास ही होगा.






