मिशन 2027:कोटद्वार में भाजपा की सियासत का दिलचस्प इतिहास,बड़े नेताओं पर दांव स्थानीय नेताओं की दावेदारी पर सवाल

उत्तराखंड | कोटद्वार | हिमांशु बडोनी

उत्तराखंड की राजनीति में कोटद्वार विधानसभा सीट अपनी अलग पहचान रखती है.यहां भाजपा की चुनावी रणनीति पर नजर डालें तो एक सवाल बार-बार उठता है—क्या पार्टी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भरोसा करने के बजाय दूसरे क्षेत्रों से आने वाले चर्चित चेहरों को चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति पर अधिक निर्भर रही है? वर्ष 2005 के उपचुनाव से लेकर 2022 के विधानसभा चुनाव तक उम्मीदवारों का बदलता क्रम इस सवाल को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में लाता है.
2005 के उपचुनाव में अनिल बलूनी, 2007 में शैलेंद्र सिंह रावत, 2012 में भुवन चंद्र खंडूड़ी, 2017 में हरक सिंह रावत और 2022 में ऋतु खंडूड़ी भूषण को भाजपा ने कोटद्वार से चुनावी मैदान में उतारा.इन नामों में स्थानीय राजनीति से जुड़े शैलेंद्र सिंह रावत को छोड़कर अन्य चेहरों की राजनीतिक पहचान मुख्य रूप से कोटद्वार से बाहर की राजनीति से जुड़ी रही.हालांकि,हर चुनाव में उम्मीदवार बदलने के पीछे पार्टी की रणनीति, राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय समीकरणों की भूमिका को भी समझना जरूरी है.
अब विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा के सामने एक बार फिर उम्मीदवार चयन का सवाल खड़ा है.क्या पार्टी इस बार स्थानीय संगठन से किसी नेता को मौका देगी या फिर किसी नए चर्चित चेहरे को मैदान में उतारकर अपनी चुनावी रणनीति को आगे बढ़ाएगी?

2005 से 2022 तक: उम्मीदवार बदले, स्थानीय दावेदारी का सवाल कायम

कोटद्वार में भाजपा के उम्मीदवारों का इतिहास पार्टी की चुनावी रणनीति में लगातार बदलाव की कहानी बयां करता रहा है.

2005 के उपचुनाव में अनिल बलूनी को मिला मौका

वर्ष 2005 में कोटद्वार विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने अनिल बलूनी को चुनावी मैदान में उतारा.उस समय बलूनी को स्थानीय राजनीति से बाहर का चेहरा माना जाता था.इस उपचुनाव में कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने जीत दर्ज की.
यह चुनाव भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत राजनीतिक आधार तैयार करने की चुनौती भी दिखाता है.

2007: स्थानीय नेता शैलेंद्र सिंह रावत पर जताया भरोसा

2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने स्थानीय राजनीति से जुड़े शैलेंद्र सिंह रावत को टिकट दिया.उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सुरेंद्र सिंह नेगी को महज 900 वोटों के अंतर से हराकर जीत दर्ज की.यह परिणाम भाजपा के लिए महत्वपूर्ण था.इस परिणाम नें दिखाया कि स्थानीय पहचान रखने वाला उम्मीदवार भी कड़े मुकाबले में जीत हासिल कर सकता है.लेकिन इसके बाद पार्टी ने कोटद्वार में शैलेन्द्र सिंह रावत कों दोबारा विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया.इस फैसले के पीछे क्या कारण थे,इसके पीछे कई कारण हैं,लेकिन उम्मीदवार बदलने का तथ्य पार्टी की रणनीति पर सवाल जरूर खड़े करता है.

2012: भुवन चंद्र खंडूड़ी जैसे बड़े चेहरे को उतारा

2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पर्व विधायक शैलेन्द्र सिंह रावत का टिकत काटक़र मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी को कोटद्वार से उम्मीदवार बनाया.यह एक बड़ा राजनीतिक फैसला था,क्योंकि खंडूड़ी की पहचान प्रदेशव्यापी थी,लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने उन्हें हरा दिया.इस चुनाव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि क्या किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को मैदान में उतारना ही जीत की गारंटी हो सकता है? कोटद्वार का परिणाम बताता है कि उम्मीदवार की पहचान के साथ-साथ स्थानीय जनसंपर्क, संगठन और क्षेत्रीय मुद्दे भी अहम होते हैं.

2017: हरक सिंह रावत के सहारे भाजपा ने हासिल की बड़ी जीत

2017 में भाजपा ने एक बार फिर कोटद्वार के भाजपा नेताओं कों दरकिनार क़र बाहर से आए हरक सिंह रावत को कोटद्वार से चुनाव लड़ाया.हरक सिंह रावत प्रदेश की राजनीति में एक चर्चित चेहरा थे.इस बार भाजपा की रणनीति सफल रही और हरक सिंह रावत ने कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी को 11,318 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया.इस जीत के बाद भाजपा के लिए कोटद्वार में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर था.लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने फिर उम्मीदवार बदल दिया.इससे स्थानीय स्तर पर लगातार राजनीतिक आधार तैयार करने और किसी एक नेता को लंबे समय तक आगे बढ़ाने की रणनीति पर सवाल उठने लगे.

2022: ऋतु खंडूड़ी भूषण को मिला टिकट

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर कोटद्वार के भाजपा नेताओं की दावेदारी कों दरकिनार करतें हुए यमकेश्वर विधानसभा से भाजपा विधायक रही ऋतु खंडूड़ी भूषण को कोटद्वार से उम्मीदवार बनाया.इस चुनाव में ऋतु खंडूड़ी भूषण नें कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी को 3,687 वोटों से हराकर सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रखा.हालांकि इस चुनाव में जीत हार का अंतर बहुत कम रह गया लेकिन भाजपा नें प्रत्याशी बदलों की अपनी पुरानी रणनीति पर क़ायम रहते हुए जीत हासिल की.

इस तरह 2005 से 2022 तक कोटद्वार में भाजपा के उम्मीदवार लगातार बदलते रहे.पार्टी ने अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग चेहरों को मौका दिया.हालांकि, इन सभी उम्मीदवारों को केवल एक-एक बार टिकट मिलने के पैटर्न को पूरी तरह एक समान राजनीतिक नीति कहना उचित नहीं होगा, लेकिन स्थानीय नेतृत्व को लगातार अवसर दिए जाने का सवाल अपनी जगह कायम है.

आखिर क्यों स्थानीय नेताओं के बजाय बाहरी चेहरों पर दांव लगाती रही भाजपा?

कोटद्वार भाजपा की राजनीति को समझने के लिए केवल उम्मीदवारों की सूची देखना पर्याप्त नहीं है.इसके पीछे संगठनात्मक समीकरणों, नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा और टिकट वितरण की राजनीति को भी समझना होगा.स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में भाजपा के भीतर गुटबाजी और नेताओं के बीच खींचतान की बात अक्सर सामने आती रही है.आरोप यह भी लगाया जाता है कि स्थानीय नेता एक-दूसरे को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे रहते हैं.ऐसी स्थिति में पार्टी नेतृत्व के सामने किसी एक स्थानीय नेता पर सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है.स्थानीय दावेदारों के बीच ज़ब सहमति नहीं बनती हैं तो प्रदेश नेतृत्व किसी ऐसे चेहरे को टिकट देने का विकल्प चुन लेता है,जिसकी अपनी राजनीतिक पहचान हो और जिसके नाम पर संगठन को एकजुट किया जा सके.

मिशन-2027: क्या भाजपा फिर किसी नए चेहरे को देगी मौका?

2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कोटद्वार में भाजपा की टिकट राजनीति पर निगाहें टिकना स्वाभाविक है.सवाल यह है कि पार्टी इस बार किस आधार पर उम्मीदवार चुनेगी?क्या स्थानीय नेताओं में से किसी एक पर भरोसा जताया जाएगा? या फिर संगठन के भीतर चल रही दावेदारी और आपसी प्रतिस्पर्धा को सुलझाकर स्थानीय चेहरे को आगे बढ़ाएगी? या फिर प्रदेश स्तर पर पहचान रखने वाले किसी नए नेता को कोटद्वार से चुनाव लड़ाने का फैसला लेंगी. पिछले चुनावों का क्रम पार्टी के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखता है—क्या कोटद्वार में स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने का समय आ गया है, या पार्टी एक बार फिर किसी नए चेहरे के जरिए चुनावी मैदान में उतरना पसंद करेगी?
निष्कर्ष: टिकट किसे मिलेगा, उससे बड़ा सवाल है स्थानीय नेतृत्व का भविष्य
कोटद्वार में 2005 से 2022 तक भाजपा के उम्मीदवारों का बदलता क्रम पार्टी की चुनावी रणनीति का एक दिलचस्प पहलू