चीन की मदद से पाकिस्तान के 6 सैटेलाइट भारत की क़र रहें है जासूसी,कश्मीर से लेकर उत्तर तक फैला है नेटवर्क

भारत पर निगरानी रखने की कोशिशों को पाकिस्तान तेज कर रहा है.चीन की मदद से पाकिस्तान ने अपनी अंतरिक्ष-आधारित निगरानी क्षमताओं का विस्तार किया है.पाकिस्तान ने सिर्फ 16 महीनों के अंदर छह अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (पृथ्वी पर नजर रखने वाले उपग्रह) लॉन्च किए हैं.इनके जरिए उसने पृथ्वी से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर एक ऐसा नेटवर्क (कॉन्स्टेलेशन) बना दिया है, जो भारत के बड़े क्षेत्र की निगरानी कर सकता है.

साल 1961 में स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमीशन की स्थापना के बाद पाकिस्तान की सैटेलाइट लॉन्च करने की रफ्तार काफी धीमी रही.साल 2024 तक उसने गिनती के कुछ सैटेलाइट लॉन्च किए.वहीं जनवरी 2025 से अप्रैल 2026 तक सिर्फ 16 महीने में पाकिस्तान ने छह नए अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट तैनात किए हैं. इनमें ऑप्टिकल इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल और रिमोट-सेंसिंग प्लेटफॉर्म शामिल हैं.


क्या होगा इन सैटेलाइट का इस्तेमाल

पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर (मई, 2025) के बाद से स्पष्ट तौर पर अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की कोशिश की है.दिलचस्प बात यह है कि उसके सैटेलाइट लॉन्च में तेजी पहलगाम हमले और भारत के ऑपरेशन सिंदूर से पहले ही शुरू हो गए थे.विशेषज्ञों का कहना है कि इन सैटेलाइट का महत्व इस बात में है कि वे सामूहिक रूप से क्या कर सकते हैं.

भारतीय नौसेना के पूर्व फ्लैग ऑफिसर रियर एडमिरल सुधीर पिल्लई का कहना है कि सोलह महीनों के भीतर किए गए इन सैटेलाइट लॉन्च से एक नेटवर्क (कॉन्स्टेलेशन) बना है. यह कोई आम नागरिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सिस्टम नहीं है, जिसका सैन्य इस्तेमाल हो सकता है. इसका ऑर्बिटल आर्किटेक्चर, इसके सेंसर और इसकी संस्थागत पृष्ठभूमि इसे अलग और ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है

भारत की निगरानी में सक्षम’

द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के इस नेटवर्क में ऐसे सैटेलाइट शामिल हैं ,जो हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने, जमीन पर हो रहे बदलावों की पहचान करने, छिपी हुई वस्तुओं का पता लगाने और रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों पर लगातार निगरानी रखने में सक्षम हैं.इससे साफ है कि पाकिस्तान को भारत में सैन्य हलचल और दूसरी गतिविधियों का पता चल सकता है.

अक्टूबर 2025 में लॉन्च किया गया पाकिस्तान का हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट HS-1 अलग-अलग पदार्थों के बीच अंतर कर सकता है. यह ऐसी वस्तुओं की पहचान कर सकता है, जो पारंपरिक ऑप्टिकल सेंसर की पकड़ में नहीं आ पाती हैं.वहीं PRSC-EO2 और PRSC-EO3 जैसे नए सैटेलाइट में एडवांस्ड इमेजिंग और AI-आधारित डेटा प्रोसेसिंग क्षमताएं हैं.

चीन की पाकिस्तान को मदद

पाकिस्तान की सैटेलाइट लॉन्चिंग में तेजी चीन की मदद से संभव हुई है.कई सैटेलाइट चीनी रॉकेटों के जरिए लॉन्च किए गए हैं.वहीं कुछ को पाकिस्तानी और चीनी संस्थाओं से मिलकर बनाया है. यह साझेदारी लॉन्च सेवाओं से आगे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, सैटेलाइट डिजाइन और डेटा-शेयरिंग की व्यवस्था तक शामिल है.

अप्रैल 2026 में लॉन्च किए गए PRSC-EO3 पर खासतौर से ध्यान देने की जरूरत है.अमेरिकी स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस फर्म COMSPOC के विश्लेषण से पता चला है कि इस सैटेलाइट को ऐसी कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित किया गया, जिससे दक्षिण एशिया पर नजर रखने का मौका मिलता है. यह उत्तरी भारत (जिसमें जम्मू-कश्मीर भी शामिल है) के ऊपर निगरानी करती है.

भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?

अंतरिक्ष और रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि निगरानी का यह उभरता हुआ ढांचा पाकिस्तान को पूरे क्षेत्र में सैन्य तैनाती, बुनियादी ढांचे के विकास और रणनीतिक गतिविधियों की बहुत स्पष्ट तस्वीर दे सकता है.चीन के अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन नेटवर्क के साथ मिलकर यह सिस्टम इस्लामाबाद की खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमताओं को काफी बढ़ा सकता है.

पाकिस्तान का यह घटनाक्रम भारत के लिए एक संवेदनशील समय पर सामने आया है.पिछले दो वर्षों में ISRO को कई रणनीतिक सैटेलाइट मिशनों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिनमें अर्थ-ऑब्जर्वेशन और नेविगेशन प्रोग्राम से जुड़ी विफलताएं शामिल हैं। भारत अधिक उन्नत अंतरिक्ष शक्ति है लेकिन पाकिस्तानी की बढ़ती सैन्य-अंतरिक्ष क्षमता पर ध्यान देना जरूरी है.