अनिल बलूनी के करीबी कैंथोला की संगठन में वापसी नहीं होंने पर बलूनी खेमे की नाराजगी की चर्चाएं तेज,अरविंद,त्रिवेंद्र भी बड़ा रहें सियासी बेचैनी

भाजपा की अंदरूनी सियासत में फिर उभरी खींचतान?

विपिन कैंथोला की संगठन में वापसी न होने से बलूनी खेमे की नाराजगी की चर्चाएं तेज, अरविंद पांडे और त्रिवेंद्र रावत भी बढ़ा रहे सियासी बेचैनी

देहरादून। उत्तराखंड भाजपा में संगठनात्मक फेरबदल के बाद एक बार फिर अंदरूनी सियासत को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. पूर्व प्रदेश प्रवक्ता विपिन कैंथोला को इस बार प्रदेश प्रवक्ताओं की टीम और प्रदेश कार्यसमिति में जगह नहीं मिलने को राजनीतिक गलियारों में महज संगठनात्मक चयन नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर चल रही गुटीय समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.

कैंथोला पहले भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.2022 में भी वे प्रदेश प्रवक्ता के तौर पर पार्टी की ओर से सार्वजनिक रूप से बयान देते नजर आए थे.

अब सवाल यह उठ रहा है कि लंबे समय तक संगठन और मीडिया के मोर्चे पर सक्रिय रहे कैंथोला को नई टीम में जगह क्यों नहीं मिली? खास तौर पर तब, जब राजनीतिक हलकों में उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी के करीबी लोगों में गिना जाता रहा है.

कैंथोला की अनदेखी या सामान्य संगठनात्मक फैसला?

यहां से उत्तराखंड भाजपा की अंदरूनी राजनीति का असली सवाल खड़ा होता है.क्या कैंथोला को जिम्मेदारी नहीं मिलना केवल संगठन का सामान्य निर्णय है या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी छिपा है?

इसको सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अनिल बलूनी के रिश्तों में तल्खी का प्रमाण कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी. लेकिन भाजपा के भीतर पिछले कुछ समय से चल रही राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए इस फैसले का राजनीतिक गुणा भाग जरूर शुरू हो गया है.

दिलचस्प बात यह है कि हालिया संगठनात्मक बदलावों में उत्तराखंड भाजपा के कई बड़े चेहरों की भूमिका बदली है.भाजपा संगठन से प्राप्त जानकारी के अनुसार अनिल बलूनी अपनी पूर्व भूमिका में ही रहेंगे, जबकि प्रदेश प्रभारी और संगठन महामंत्री से जुड़े पदों को लेकर भी बदलाव और रिक्तियों की स्थिति बनी हुई है.

बलूनी खेमा और धामी सरकार—क्यों उठते हैं सवाल?

उत्तराखंड भाजपा की राजनीति में अनिल बलूनी लंबे समय से प्रभावशाली चेहरा रहे हैं. ऐसे में उनके करीबी माने जाने वाले किसी नेता को संगठन में अपेक्षित जगह नहीं मिलती है तो राजनीतिक विश्लेषक स्वाभाविक रूप से इसे शक्ति-संतुलन के नजरिए से देखते हैं.

यही वजह है कि कैथोला प्रकरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या 2027 से पहले भाजपा संगठन में मुख्यमंत्री समर्थक और दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक समूहों के बीच समीकरण नए सिरे से तय किए जा रहे हैं?

हालांकि, इसका जवाब आने वाले दिनों में संगठनात्मक नियुक्तियों और नेताओं की राजनीतिक सक्रियता से ही साफ होगा.

अरविंद पांडे की नाराजगी ने भी बढ़ाई थी हलचल

भाजपा के भीतर असंतोष की चर्चाओं को हवा देने वाला एक और नाम गदरपुर विधायक अरविंद पांडे का है. मई-जून 2026 में पांडे को लेकर पार्टी के भीतर खींचतान की चर्चाएं तेज हुई थीं. उनके आवास पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की आवाजाही और बाद में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उनसे मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

एक कथित पत्र को लेकर भी पांडे का नाम विवाद में आया था, हालांकि पांडे ने उस पत्र से अपना संबंध होने से बाद में इनकार किया था.

यानी भाजपा के भीतर असंतोष की चर्चाएं केवल संगठन के पदों तक सीमित नहीं हैं. चुनाव से पहले पार्टी के भीतर नेताओं की नाराजगी, मुलाकातें और शक्ति-संतुलन लगातार राजनीतिक चर्चा का विषय बने हुए हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की भूमिका भी महत्वपूर्ण

इस पूरे समीकरण में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाम भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भाजपा की प्रदेश राजनीति में त्रिवेंद्र का अपना मजबूत राजनीतिक आधार है.अरविंद पांडे से जुड़े घटनाक्रम के दौरान अनिल बलूनी, त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का पांडे के आवास पर पहुंचना भी सियासी तौर पर चर्चा में रहा था.

यही कारण है कि 2027 की तैयारी के दौर में भाजपा के भीतर हर नियुक्ति, हर मुलाकात और हर राजनीतिक दूरी को अब बड़े समीकरणों के संदर्भ में देखा जा रहा है.

2027 से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती—एकजुटता

भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है.सरकार विकास और सुशासन के मुद्दों को आगे रख रही है और संगठन भी चुनावी तैयारियों में जुटा है.

लेकिन चुनावी राजनीति में सिर्फ सरकार की उपलब्धियां ही पर्याप्त नहीं होतीं. संगठन के भीतर सभी प्रभावशाली नेताओं को साथ रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है.

विपिन कैथोला की संगठन में मौजूदा भूमिका को लेकर उठे सवाल, अरविंद पांडे की पूर्व नाराजगी और त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता—इन तीनों को जोड़कर देखें तो उत्तराखंड भाजपा में 2027 से पहले एक बात साफ दिखाई देती है कि सत्ता और संगठन के भीतर शक्ति-संतुलन का खेल अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है.

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि कैंथोला को जगह न मिलने के पीछे सीधे तौर पर बलूनी-धामी मतभेद हैं.लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के भीतर नियुक्तियों के बहाने पुराने राजनीतिक समीकरणों की चर्चा फिर तेज हो गई है.

अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में भाजपा संगठन किसे आगे बढ़ाता है, किसे किनारे करता है और 2027 के चुनावी मैदान में धामी मॉडल, बलूनी प्रभाव और पुराने दिग्गजों के राजनीतिक अनुभव के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है.

सियासी सवाल यही है कि कैंथोला की अनदेखी महज संगठनात्मक फैसला है या 2027 से पहले भाजपा के भीतर बदलते शक्ति-समीकरण का संकेत?