हिमालयी क्षेत्र में लगातार आ रही आपदाओं कों रोकने के लिए बने पर्यावरणीय नीति -डॉ अनिल जोशी

हिमालय में एक कोने की त्रासदी का खामियाजा कई देशों को भुगतना पड़ेगा: डॉ. अनिल जोशी

देहरादून। पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी ने हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई है.उन्होंने कहा कि हिमालय केवल किसी एक देश या राज्य की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पारिस्थितिकी का असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ता है.
डॉ. जोशी ने कहा कि हिमालय में जब भी किसी एक कोने में कोई बड़ी त्रासदी होगी, उसका खामियाजा कई देशों को भुगतना पड़ेगा.हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों के जीवन और अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं.ऐसे में हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय बदलाव सीमाओं के भीतर नहीं रुकता.
उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप, अनियोजित निर्माण, सड़कों का अत्यधिक विस्तार और जंगलों एवं जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव हिमालय की संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है.हिमालय को केवल विकास की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक जीवित और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में समझने की जरूरत है.
डॉ. जोशी ने हिमालयी देशों से साझा रणनीति बनाने की अपील करते हुए कहा कि आपदाओं को केवल राहत और बचाव तक सीमित रखकर नहीं देखा जा सकता.हिमालय की सुरक्षा के लिए नेपाल, भारत, भूटान, तिब्बत क्षेत्र समेत पूरे हिमालयी भूभाग को लेकर सामूहिक पर्यावरणीय नीति बनानी होगी.
उन्होंने चेताया कि यदि समय रहते हिमालय के साथ हो रहे हस्तक्षेप को नहीं रोका गया तो आने वाले वर्षों में आपदाओं की तीव्रता और उनका दायरा दोनों बढ़ सकते हैं.

हिमालय की सुरक्षा दरअसल करोड़ों लोगों के भविष्य की सुरक्षा है.