उत्तराखंड की राजनीति में खुद कों भीष्म पितामाह साबित करना चाहते हैं हरक सिंह रावत,कई विधायकों,मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों कों बता चुके हैं अपना चेला

उत्तराखंड की राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ बनने की कोशिश में हरक सिंह रावत?

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अपने बेबाक अंदाज, राजनीतिक दांव-पेच और लगातार बदलते समीकरणों के लिए पहचाने जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. हरक सिंह रावत इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं. 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच हरक सिंह रावत जिस तरह प्रदेश की राजनीति में मुखर हैं और लगातार तीखी बयानबाजी क़र रहें हैं उससे सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या वह अब खुद चुनावी मैदान से ज्यादा ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आना चाहते हैं?
हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. जिस नेता ने चार दशक से अधिक समय में उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक कई विधानसभा सीटों पर अपनी राजनीतिक जमीन बनाई, वही नेता 2027 में किस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे, इस सवाल का स्पष्ट जवाब उनके पास भी नहीं हैं.मई 2026 में हरक सिंह रावत ने कहा था कि कांग्रेस जहां से कहेगी—सहसपुर, धर्मपुर,कोटद्वार या चौबट्टाखाल वहां से चुनाव लड़ेंगे और सीट जल्द तय करने की उन्होंने बात कही थी.लेकिन अगस्त 2026 तक कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत कहाँ से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे यह तस्वीर अभी तक साफ नहीं हो पाई है.

‘हर जगह मेरा चेला’ वाली राजनीति?

हरक सिंह रावत की राजनीति का एक खास अंदाज रहा है कि वह प्रदेश के अलग-अलग राजनीतिक खेमों में अपनी पहुंच और नेताओं के साथ अपने संबंधों को खुलकर सामने रखते आए हैं. मौजूदा दौर में भी वह कई वरिष्ठ नेताओं, विधायकों, मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ केंद्रीय नेताओं और मंत्रियों के साथ अपने राजनीतिक रिश्तों का जिक्र करते दिखाई देते नजर आ रहें हैं.इसी वजह से सियासी चर्चाओं में यह सवाल उठ रहा है कि क्या हरक सिंह रावत 2027 में किसी एक विधानसभा सीट तक सीमित रहने के बजाय पूरे प्रदेश के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने वाले वरिष्ठ नेता की भूमिका तलाश रहे हैं,या फिर राजनीतिक छटपटाहट के कारण वह चेलों का जिक्र क़र रहें हैं.
कांग्रेस पार्टी ने हरक सिंह रावत कों नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रबंधन समिति का प्रमुख बनाया था.यानी पार्टी ने उन्हें चुनावी रणनीति और प्रबंधन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर साफ किया कि हरक सिंह रावत कों वह एक सीट तक सीमित नहीं करना चाहते हैं बल्कि उनके राजनीतिक अनुभव और बेवाकी का उत्तराखंड की सभी 70 विधानसभा सीटों पर लाभ उठानी चाहती हैं.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल—खुद कहां से लड़ेंगे?

हरक सिंह रावत के सामने फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही हैं कि वह 2026 का विधानसभा चुनाव कहाँ से लड़े.हालांकि हरक सिंह रावत गढ़वाल मंडल की कुछ विधानसभा सीटों कों खुद नाम बता चुके हैं कि वह वहां से चुनाव लड़ने चाहेंगे,लेकिन कांग्रेस पार्टी आलाकमान ने अभी तक ऐसा कोई इशारा नहीं किया कि हरक सिंह रावत कहाँ से चुनाव लड़ेंगे.और वजह थी की फरवरी 2026 में भी कांग्रेस के बड़े नेताओं की सीटों को लेकर असमंजस की खबरों में हरक सिंह रावत का नाम प्रमुखता से आया था.
यही स्थिति उनके राजनीतिक विरोधियों को हमला करने का मौका भी देती है.सवाल उठाया जा रहा है कि जब पार्टी के चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहे नेता को अपनी ही सीट को लेकर अंतिम निर्णय का इंतजार हो, तो क्या यह उनके राजनीतिक प्रभाव में आई किसी नई चुनौती का संकेत है?

पहली बार दिख रही है ‘छटपटाहट’?

हरक सिंह रावत की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वह आसानी से राजनीतिक मैदान छोड़ने वाले नेता नहीं रहे हैं. लेकिन 2027 के चुनाव से पहले उनकी सक्रियता और बयानबाजी को कुछ लोग उनकी राजनीतिक बेचैनी के रूप में भी देख रहे हैं.
हालांकि इसे‘छटपटाहट’ कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि हरक सिंह रावत अपनी पुरानी शैली के मुताबिक चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में बनाने में माहिर रहें हैं.
उनका हालिया सार्वजनिक अंदाज बताता है कि वह अभी भी उत्तराखंड की राजनीति में अपनी भूमिका को सीमित नहीं मानते.

हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर

1989-छात्र राजनीति से प्रदेश की राजनीति में कदम रखने वाले हरक सिंह रावत ने पहला चुनाव पौड़ी से विधानसभा के भाजपा प्रत्याशी के रुप में लड़ा लेकिन कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह भंडारी ने उन्हें 18,312 वोटों से हरा दिया.इसके बाद हरक सिंह रावत ने अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करने पर ध्यान दिया और वह पौड़ी में सक्रिय हो गए.

1991 — राजनीति में बड़ा ब्रेक

हरक सिंह रावत ने पौड़ी विधानसभा सीट से उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता और कम उम्र में ही उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बने.इस चुनाव में भाजपा से चुनावी मैदान में उतरे हरक सिंह रावत ने कांग्रेस के पुष्कर सिंह रौथाण कों 10,692 वोटों से हरा दिया.यही वह दौर था जब उन्होंने राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू की.प्राप्त जानकारी के अनुसार 1991 में वह उत्तर प्रदेश सरकार में पर्यटन राज्य मंत्री बने.

1993-में हरक सिंह रावत दूसरी बार जीते

1993 में हरक सिंह रावत ने पौड़ी विधानसभा सीट से जीत दर्ज की.लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचकर उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की.इस चुनाव में भाजपा से चुनावी मैदान में उतरे हरक सिंह रावत ने कांग्रेस के पुष्कर सिंह रौथाण कों 5,326 वोटों से हराकर जीत हसील की.

1996 — पहला बड़ा झटका

1996 में पौड़ी से जनता दल के प्रत्याशी के रुप में चुनावी मैदान में उतरे हरक सिंह रावत चुनाव कों भारतीय जनता पार्टी के मोहन सिंह ने 27,416 वोटों से हार दिया .यह हरक सिंह रावत के राजनीतिक सफर का पहला महत्वपूर्ण झटका था.इसके बाद हरक सिंह रावत ने अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव किया.

1998 — लोकसभा की कोशिश

1998 में गढ़वाल लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी से चुनावीं मैदान में उतरे हरक सिंह रावत कों भारतीय जनता पार्टी के भुवन चंद खंडूडी ने 2,34,990 वोटों के अंतर से हरा दिया जों उनके राजनीतिक जीवन की बड़ी हारों में से एक थी.

2002 — उत्तराखंड बनने के बाद राजनीति में फिर वापसी

उत्तराखंड गठन के बाद 2002 में लैंसडाउन विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे.इस विधानसभा चुनाव में हरक सिंह रावत ने भाजपा के भारत सिंह रावत कों मात्र 468 वोटों से हराकर जीत हासील की थी.इसके बाद उन्हें कांग्रेस सरकार में राजस्व, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास जैसे विभागों की जिम्मेदारी मिली.

2007 — लैंसडाउन से फिर जीत, विपक्ष के नेता बने

2007 में लैंसडाउन से दोबारा जीत दर्ज की और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने.इस बार भी हरक सिंह रावत ने भाजपा के भारत सिंह रावत कों 3,818 वोटों से हराकर राज्य विधानसभा में कदम रखा था,लेकिन सत्ता से दूर रही इस चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर उनका राजनीतिक कद और बढ़ा दिया.

2012 — सीट बदली, जीत बरकरार

2012 में उन्होंने लैंसडाउन छोड़कर हरक सिंह रावत ने रुद्रप्रयाग से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.इस चुनाव में हरक सिंह रावत ने भाजपा के मातबर कंडारी 1,326 वोटों से हराकर जीत हसील की और कांग्रेस सरकार में मंत्री बने

2014 — लोकसभा चुनाव में हार

2014 में गढ़वाल लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरक सिंह रावत ने चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के भुवन चंद खंडूड़ी ने उन्हें 1,84,526 वोटों से हरा दिया.

2016 — कांग्रेस की सरकार गिरा क़र भाजपा में हुए शामिल

2016 के राजनीतिक संकट के दौरान हरक सिंह रावत कांग्रेस से अलग होकर भाजपा खेमे में चले गए. यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दल-बदल था और इसके बाद वह भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.

2017 — भाजपा के टिकट पर कोटद्वार से जीत

2017 में भाजपा के टिकट पर हरक सिंह रावत ने कोटद्वार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की. उन्हें भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2017 में उन्हें 39,859 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सुरेन्द्र सिंह नेगी कों 11,318 वोटों से हराकर जीत हसील की.

2017–2022 तक भाजपा सरकार में रहें कैबिनेट मंत्री

त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी—तीनों मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में हरक सिंह रावत कैबिनेट मंत्री रहे.
यहीं से हरक सिंह रावत का राजनीतिक प्रभाव और उनके बयानों की चर्चा लगातार बढ़ती रही.

जनवरी 2022 — भाजपा से निष्कासन

भाजपा में रहते भाजपा के नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले हरक सिंह रावत कों विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया और मंत्रिमंडल से भी हटा दिया.भाजपा ने उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाया था.

2022 — कांग्रेस में वापसी, लेकिन कांग्रेस ने हरक सिंह की जगह बहू कों दिया टिकट

21 जनवरी 2022 को वह कांग्रेस में वापस लौटे हरक सिंह रावत कों कांग्रेस पार्टी ने टिकट नहीं दिया बल्कि उनकी बहू अनुकृति कों चुनावी मैदान में लैसडाउन विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा था,लेकिन वह भाजपा से चुनाव हार गईं थी.हरक सिंह रावत के राजनीतिक ज़ीवन का यह बहुत बड़ा बदलाव था, क्योंकि उत्तराखंड बनने के बाद 2002, 2007, 2012 और 2017—चारों विधानसभा चुनावों में उन्होंने जीत हासिल की थी.लेकिन पहली बार ऐसा हुआ ज़ब 2022 में उन्हें टिकट नहीं दिया गया.

2023–2025 — भाजपा पर लगातार हमलावर

कांग्रेस में लौटने के बाद हरक सिंह रावत भाजपा सरकार और उसके नेताओं पर लगातार राजनीतिक हमले करते रहे.2025 में भी उनके भाजपा पर लगाए गए आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया, जिन्हें भाजपा ने खारिज किया.

नवंबर 2025 — कांग्रेस ने दी बड़ी जिम्मेदारी

कांग्रेस ने संगठनात्मक बदलाव के दौरान हरक सिंह रावत को चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बनाया.2027 के चुनाव में यह जिम्मेदारी उनके राजनीतिक कद को दर्शाती है.

2026 — 2027 की तैयारी और सीट का संकट

2026 में हरक सिंह रावत लगातार कांग्रेस की चुनावी गतिविधियों में सक्रिय हैं. लेकिन उनकी अपनी सीट को लेकर अभी भी तस्वीर साफ नहीं है.यानी जिस नेता ने पौड़ी, लैंसडाउन, रुद्रप्रयाग और कोटद्वार से चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पहुंच का विस्तार किया, उसके सामने 2027 में फिर वही सवाल खड़ा है—अगला राजनीतिक पड़ाव कौन सा होगा?

किंगमेकर’ बनेंगे या फिर खुद मैदान में उतरेंगे?

हरक सिंह रावत की मौजूदा राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यही है.एक तरफ वह कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, दूसरी तरफ अपनी विधानसभा सीट तय करने में अभी तक अंतिम तस्वीर सामने नहीं रख पाए हैं.
2027 के चुनाव में कांग्रेस के लिए उनकी उपयोगिता दो स्तरों पर हो सकती है—संगठन और चुनावी रणनीति में अनुभव, तथा अलग-अलग क्षेत्रों में उनका व्यक्तिगत राजनीतिक संपर्क.
लेकिन दूसरी ओर, पार्टी के भीतर टिकट की दावेदारी और स्थानीय समीकरण भी उनके लिए चुनौती होंगे.

असली परीक्षा 2027 में

हरक सिंह रावत ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार दल बदले, कई विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव जीता, मंत्री बने, नेता प्रतिपक्ष रहे और सत्ता के भीतर तथा विपक्ष दोनों में प्रभावशाली भूमिका निभाई.अब 2027 उनके लिए एक अलग तरह की परीक्षा होगी,क्या वह अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए फिर विधानसभा पहुंचेंगे?