नेपाल की त्रासदी ने फिर चेताया—हिमालय से छेड़छाड़ पड़ सकती है भारी
डॉ. अनिल जोशी की हिमालय को लेकर चिंता के बीच बड़ा सवाल—क्या विकास के नाम पर कमजोर हो रहे हैं पहाड़? उत्तराखंड के लिए भी खतरे की घंटी
देहरादून। नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है.ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने से शुरू हुई इस आपदा ने बर्फ, चट्टान, मिट्टी और पानी का ऐसा सैलाब पैदा किया कि कई गांव, सड़कें, पुल और ऊर्जा परियोजनाएं इसकी चपेट में आ गईं.29 अगस्त तक नेपाल और तिब्बत में कम से कम 691 लोगों की मौत और करीब 3,000 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आई थी. नेपाल में ही 675 मौतें और 2,498 लोग लापता बताए गए.
इस त्रासदी ने पर्यावरणविदों की उस चिंता को फिर सामने ला दिया है कि हिमालय को केवल सड़क, सुरंग, बांध और बिजली परियोजनाओं के लिए उपलब्ध भूमि मानना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.
हिमालय को विकास नहीं, संतुलित विकास की जरूरत
पद्म भूषण पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी लंबे समय से हिमालयी पारिस्थितिकी को लेकर चेताते रहे हैं.उनकी चिंता का मूल सवाल यही है कि हिमालय की भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाओं को समझे बिना किया गया विकास भविष्य में बड़ी कीमत वसूल सकता है.
आज हिमालय की ऊंची चोटियों और दुर्गम इलाकों तक सड़कें पहुंच रही हैं. सुरंगों, चारधाम मार्गों, जलविद्युत परियोजनाओं और दूसरी बड़ी निर्माण गतिविधियों ने पहाड़ों के भीतर तक मानवीय हस्तक्षेप बढ़ाया है. सवाल यह नहीं है कि सड़क या बिजली परियोजना बननी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि हिमालय की वहन क्षमता के अनुरूप उनका निर्माण हो रहा है या नहीं.
ग्लेशियर कमजोर हुए तो नदियों के साथ मैदान भी खतरे में
नेपाल की मौजूदा त्रासदी में वैज्ञानिक आकलन ग्लेशियर के टूटने, बर्फ-चट्टान के मलबे और उसके बाद बने तेज बहाव की ओर इशारा करता है.विशेषज्ञों ने यह भी बताया है कि बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न से उच्च हिमालयी क्षेत्र अस्थिर हो रहे हैं.एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग 30 वर्षों में नेपाल ने अपने ग्लेशियरों की करीब एक-तिहाई बर्फ खो दी है.
यानी खतरा केवल पहाड़ों की चोटियों तक सीमित नहीं है.ग्लेशियरों में बदलाव का सीधा असर हिमालय से निकलने वाली नदियों, घाटियों, गांवों, शहरों और अंततः मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच सकता है.
हर आपदा को केवल ‘प्राकृतिक’ कहकर जिम्मेदारी से बचना ठीक नहीं
नेपाल की घटना का तत्काल ट्रिगर ग्लेशियर का टूटना था, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और बदलते मौसम जैसे कारक ऐसे उच्च पर्वतीय खतरों को बढ़ा सकते हैं.दूसरी तरफ सड़क, पुल, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और बस्तियों का निर्माण जोखिम वाले क्षेत्रों में बढ़ने से मानवीय जोखिम और संभावित नुकसान कई गुना बढ़ जाता है.
इसलिए हर हिमालयी आपदा को पूरी तरह ‘प्राकृतिक’ बताकर छोड़ देना भी सही नहीं है और हर घटना को केवल मानव निर्मित बताना भी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं. असली चुनौती जलवायु परिवर्तन + संवेदनशील भूगोल + बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप का खतरनाक मेल है.
पहाड़ों को विस्फोटों से काटने पर भी सवाल
हिमालय की चट्टानों को काटकर सड़क और सुरंग निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग किए जाने को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं.प्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं पदम् भूषण से सम्मानित डॉ अनिल प्रकाश जोड़ी के अनुसार हिमालय अपेक्षाकृत युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखला है. ऐसे क्षेत्र में अंधाधुंध कटान और निर्माण का असर ढलानों की स्थिरता पर पड़ सकता है.
इसका अर्थ यह नहीं कि हर ब्लास्टिंग से आपदा होती है, लेकिन भूगर्भीय अध्ययन, ढलान की स्थिरता और स्थानीय पारिस्थितिकी को नजरअंदाज करके निर्माण करना जोखिम को बढ़ा सकता है.
हाइड्रो प्रोजेक्ट भी बन रहे हैं बहस का बड़ा विषय
नेपाल की मौजूदा त्रासदी में जलविद्युत परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है.पुनर्निर्माण की लागत नेपाल के वित्त मंत्रालय के अनुमान के अनुसार 4 से 5 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है और बाढ़ से प्रभावित ऊर्जा परियोजनाएं देश की कुल ऊर्जा क्षमता के 12 प्रतिशत से अधिक हिस्से से जुड़ी बताई गई हैं.
उत्तराखंड में भी 7 फरवरी 2021 की चमोली आपदा ने दिखाया था कि हिमालयी आपदा और जलविद्युत परियोजनाओं की संवेदनशीलता एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी है. उस घटना में रैणी क्षेत्र में आई बाढ़ और मलबे ने ऋषिगंगा तथा तपोवन-विष्णुगाड परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया और करीब 200 लोगों की जान गई.
चीन की तिब्बत में सक्रियता पर भी उठते हैं सवाल
पर्यावरणविद डॉ अनिल प्रकाश जोशी के अनुसार तिब्बत में चीन द्वारा सड़क, सुरंग, बांध और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण का विस्तार हिमालयी पारिस्थितिकी पर बहस को और जटिल बनाता है. हालांकि किसी खास आपदा को केवल चीन की गतिविधियों से जोड़ने के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं,लेकिन सीमा पार बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण और जल संसाधनों के उपयोग का हिमालयी पर्यावरण पर प्रभाव एक गंभीर अध्ययन का विषय बन सकता है.
डॉ जोशी ने जानकारी देतें हुए बताया कि नेपाल-तिब्बत आपदा ने यह भी दिखाया कि सीमा पार आपदा के समय रियल-टाइम मौसम, ग्लेशियर और जल प्रवाह संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान कितना महत्वपूर्ण है. विशेषज्ञों ने भविष्य की आपदा तैयारी के लिए चीन और नेपाल के बीच बेहतर हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है.
उत्तराखंड के लिए नेपाल की त्रासदी बड़ी चेतावनी
उत्तराखंड के लिए यह घटना विशेष रूप से गंभीर चेतावनी है.राज्य में 2015 से 2024 के बीच सरकारी आपदा रिकॉर्ड में 12,758 भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं तथा 4,000 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए.
एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक उत्तराखंड के करीब 18.47 प्रतिशत क्षेत्र को उच्च से अत्यधिक उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्र में रखा गया है.इनमें उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे जिले विशेष रूप से संवेदनशील पाए गए हैं.
यही आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में विकास की रफ्तार के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा की रफ्तार बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है.
अब सवाल सड़क रोकने का नहीं, सही जगह सड़क बनाने का है
हिमालय को विकास से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन हिमालय की कीमत पर विकास भी संभव नहीं होना चाहिए.
डॉ अनिल प्रकाश जोशी बताते है कि जहां पहाड़ कमजोर है वहां भारी निर्माण से बचना होगा,जहां ग्लेशियर और झीलें संवेदनशील हैं वहां लगातार निगरानी करनी होगी,जहां भूस्खलन का खतरा है वहां निर्माण की सीमा तय करनी होगी,और हर परियोजना से पहले हिमालय की वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन करना होगा.
नेपाल की त्रासदी सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं है.यह पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है.
पर्यावरणविद डॉ जोशी के अनुसार अगर हिमालय सुरक्षित रहेगा तो उसकी नदियां, जंगल, ग्लेशियर और करोड़ों लोगों का भविष्य सुरक्षित रहेगा. लेकिन अगर पहाड़ की सहनशक्ति को लगातार चुनौती दी गई, तो आने वाली आपदाएं पहले से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती हैं.




