सियासत की आख़िरी पारी,क्या सुरेन्द्र सिंह नेगी के साथ ख़डी होंगी कोटद्वार की जनता

कोटद्वार। उत्तराखंड की सियासत में कोटद्वार विधानसभा सीट एक बार फिर 2027 के चुनाव से पहले चर्चा में है.कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि वह अपनी लंबी राजनीतिक पारी का अंतिम विधानसभा चुनाव पूरे दमख़म के साथ लड़ने जा रहें है.
नेगी के समर्थक इसे महज एक चुनाव नहीं, बल्कि कोटद्वार के विकास की उस राजनीति की वापसी के तौर पर देख रहे हैं, जिसे वे अपने कार्यकाल से जोड़ते हैं.समर्थकों का कहना है कि कोटद्वार में सिडकुल की स्थापना से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं, पुलों, सड़कों और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्य आज भी कोटद्वार की राजनीतिक पहचान हैं,जिसका श्रेय सिर्फ औऱ सिर्फ सुरेन्द्र सिंह नेगी कों जाता है.

सिडकुल से लेकर अस्पताल तक—विकास कार्यों की लंबी फेहरिस्त

सुरेंद्र सिंह नेगी के समर्थक कोटद्वार के विकास में उनके योगदान को गिनाते हुए कहते है कि उनके कार्यकाल के दौरान कोटद्वार में सिडकुल की स्थापना, ट्रॉमा सेंटर, बेस अस्पताल,भाबर डिग्री कॉलेज का निर्माण,कोटद्वार में इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना के साथ ही बेस अस्पताल में करोड़ों की लागत से अत्याधुनिक मशीनें लगाई गईं,इतना ही नहीं कोटद्वार की पेयजल औऱ सिचाई व्यवस्था कों मजबूत करने के लिए दर्जनों नलकूपों का निर्माण किया गया.नेगी समर्थक बताते है कि उनके कार्यकाल के दौरान करोड़ों के पुलों का निर्माण हुआ नदी किनारे रिहायशी इलाकों कों बचाने के लिए सुरक्षा दीवारों का निर्माण हुआ,जिसका फायदा आज भी जनता कों मिल रहा है.पूर्व मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी के समर्थकों का कहना है कि नेगी ने कोटद्वार को केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक विकास और सड़क संपर्क के लिहाज से मजबूत करने का प्रयास किया.
स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए भी नेगी के समर्थक उनके कार्यकाल को स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानते हैं.उनका दावा है कि उस दौर में प्रदेश में कई ऐसी स्वास्थ्य परियोजनाओं को गति मिली, जिनका लाभ बाद के वर्षों में भी लोगों को मिला.

2012—जब मुख्यमंत्री खंडूड़ी को कोटद्वार में मिली थी हार

सुरेंद्र सिंह नेगी के राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा अध्याय 2012 का विधानसभा चुनाव माना जाता है.उस चुनाव में कोटद्वार से कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी को पराजित किया था.उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार नेगी को 31,797 वोट, जबकि खंडूड़ी को 27,174 वोट मिले थे.नेगी ने करीब 4,623 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी.यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक मानी गई क्योंकि नेगी ने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री को उनके ही विधानसभा क्षेत्र में शिकस्त दी थी.

2017 में हार, लेकिन 2022 में फिर मजबूत हुई नेगी की चुनौती

2017 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदले और भाजपा के डॉ. हरक सिंह रावत ने सुरेंद्र सिंह नेगी को 11,318 वोटों से हराया.लेकिन 2022 में कहानी फिर बदली.भाजपा की ऋतु खंडूड़ी भूषण ने 32,103 वोट हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि सुरेंद्र सिंह नेगी को 28,416 वोट मिले.औऱ इस बार जीत हार का अंतर 3,687 वोट रहें.
यानी 2017 में जहां नेगी करीब 11.318 हजार वोटों से चुनाव हारे थे, वहीं 2022 में उन्होंने मुकाबले को बेहद करीबी बना दिया.इन आंकड़ों को कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2022 में नेगी ने भाजपा के मजबूत संगठन के सामने भी 28 हजार से अधिक वोट हासिल किए,जबकि अंदरखाने कुछ कांग्रेसियों नें नेगी के खिलाफ काम करतें हुए भाजपा कों फायदा पहुंचाया था.

‘दुष्प्रचार’ और अंदरूनी कलह को हार की वजह बताते हैं समर्थक

नेगी समर्थक उनकी पिछली हार के लिए भाजपा के चुनावी दुष्प्रचार और कांग्रेस की कथित अंदरूनी खींचतान को जिम्मेदार बताते रहे हैं.विशेष रूप से भगवंत ग्लोबल इंजीनियरिंग कॉलेज को लेकर चुनावी दौर में चले विवाद को भी नेगी समर्थक याद करते हैं.उनका आरोप रहा है कि भाजपा की ओर से कॉलेज को लेकर ऐसा राजनीतिक प्रचार किया गया जिससे मतदाताओं में भ्रम पैदा हुआ.हालांकि इस तरह के राजनीतिक आरोपों को सुरेन्द्र नेगी औऱ उसके समर्थकों नें सिरे से खारिज क़र दिया,लेकिन चुनावी घमासान के दौरान उठें इस मुद्दे नें कांग्रेस बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया.नेगी समर्थकों का एक और आरोप है कि कांग्रेस के भीतर मौजूद कुछ ‘चाटुकार नेताओं’ और गुटबाजी ने भी चुनावी नुकसान पहुंचाया.उनका मानना है कि यदि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट होकर सुरेन्द्र सिंह नेगी के साथ खड़ी होती तो परिणाम अलग हो सकता था.

व्यक्तिगत संपर्क सबसे बड़ी ताकत

सुरेंद्र सिंह नेगी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनके समर्थक उनका व्यक्तिगत जनसंपर्क बताते हैं.समर्थकों का कहना है कि नेगी वर्षों से कोटद्वार और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के सुख-दुःख में शामिल होते रहे हैं.यही वजह है कि उम्र और लंबी राजनीतिक पारी के बावजूद क्षेत्र में उनका व्यक्तिगत नेटवर्क आज भी मजबूत माना जाता है.यही नेटवर्क 2027 के विधानसभा चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है.

भाजपा के भीतर असंतोष की चर्चाएं भी अहम

2027 के चुनाव से पहले कोटद्वार में भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी चर्चा का विषय हैं.राजनीतिक गलियारों में यह दावा किया जा रहा है कि भाजपा का एक धड़ा मौजूदा विधायक से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है.यदि यह असंतोष चुनाव तक कायम रहता है और पार्टी के भीतर टिकट या नेतृत्व को लेकर खींचतान बढ़ती है,तो कांग्रेस के लिए यह बड़ा अवसर बन सकता है.हालांकि भाजपा के अंदर किसी बड़े धड़े की नाराजगी की अभी खुलकर सामने तो नहीं आई है लेकिन सूत्रों से मिल रही जानकारी पर यदि विश्वास करें तो भाजपा के अंदर कोटद्वार में टिकट कों लेकर मचा घमासान उसके लिए मुश्किलें ख़डी क़र सकता है.

‘इस बार नेगी को जिताना चाहती है जनता’—समर्थकों का दावा

नेगी समर्थकों का सबसे बड़ा दावा यही है कि कोटद्वार की जनता अब एक बार फिर पुराने अनुभवी चेहरे को मौका देने के मूड में है.उनका तर्क है कि जनता अब राजनीतिक नारों से ज्यादा काम का हिसाब देखना चाहती है.सिडकुल, अस्पताल, ट्रॉमा सेंटर, सड़क-पुल और कॉलेज जैसे मुद्दों को लेकर नेगी समर्थक 2027 में जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहे हैं.
उनका कहना है कि “नेगी ने कोटद्वार को केवल चुनावी क्षेत्र नहीं माना, बल्कि इसे अपनी कर्मभूमि बनाकर काम किया है।”
2027 में मुकाबला हुआ तो लड़ाई सिर्फ दो चेहरों की नहीं होगी,बल्कि विकास की होगी जिसका मूल्यांकन जनता क़र रही है.नेगी समर्थक मनाते है कि चुनाव पुराने विकास कार्यों की विरासत बनाम मौजूदा कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड, व्यक्तिगत जनसंपर्क बनाम संगठनात्मक ताकत और कांग्रेस की एकजुटता बनाम भाजपा के अंदरूनी समीकरणों के बीच भी होगा.
नेगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस को एकजुट रखना होगी. अगर पिछली बार की तरह पार्टी के भीतर गुटबाजी नहीं हुई और पूरा संगठन उनके पीछे खड़ा हुआ तो 2027 में कोटद्वार का मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है.

नेगी समर्थकों का संदेश —‘एक आखिरी मौका, विकास की राजनीति के नाम’

सुरेंद्र सिंह नेगी के समर्थकों के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं है.उनके लिए यह उस नेता को अंतिम मौका देने की अपील है, जिसने 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को हराकर कोटद्वार की राजनीति में इतिहास रचा था.
2022 में महज 3,687 वोटों से हार और उससे पहले की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कांग्रेस यदि नेगी पर भरोसा जताती है तो कोटद्वार में 2027 का चुनाव उत्तराखंड की सबसे चर्चित विधानसभा लड़ाइयों में शामिल हो सकता है.
अब निगाहें कांग्रेस के फैसले और कोटद्वार की जनता के मूड पर हैं—क्या सुरेंद्र सिंह नेगी को उनकी राजनीतिक पारी के अंतिम चुनाव में जनता एक बार फिर विधानसभा भेजेगी? 2027 इस सवाल का जवाब देगा.